फिर हर दम देश की माला जपे जा रही हूँ |
जब जलती है मासूम अपने ही घर में |
मैं रो - रोके फिर अपना देश कहे जा रही हूँ |
जुल्म करता है कोई और भरता है कोई |
दुसरे के गुनाहों की सज़ा काटे जा रही हूँ |
महंगाई की मार से हरपल घबरा रही हूँ |
फिर भी अपने देश की ही माला जपे जा रही हूँ |
भ्रष्टाचार की गर्द में डूब रहा ये हरपल |
फिर भी उससे उम्मीदों की माला जपे जा रही हूँ |
मासूम बहनें और माएं रोंदी जाती है सरे राह |
मैं उनकी सजाओं की उम्मीदों में जगे जा रहीं हूँ |
बच्चे सड़कों में सरे आम हैं मारे जाते |
में पुलिस से इसकी गुहार लगाए जा रही हूँ |
जब कोई बात भी यहाँ सुलझती न दिखती |
फिर भी मेरा देश - मेरा देश कहे जा रही हूँ |