कौन जीता है किसी और की खातिर |
सबको अपनी ही बात पर रोना आया |
बूढी आँखों में न जाने किसका इंतजार हैं
खुद को सँभालने की एक नाकाम कोशिश
गालों तक लुढकते हुए आंसूं
दिल में दर्द को झुपाने की लाख कोशिश
आवाज़ को बनाये रखने का झूठा प्रयास
पर उम्र तो सब कुछ ब्यान कर देता है
विश्वाश ही है जो अभी भी जिन्दा है
दर्द एसा की एक टीस की तरह ...
कब सैलाब बनकर सुनामी का रूप ले ले |
कौन झुकना चाहता है ?
सब अपने मद मैं चूर
सबका अपना - अपना अहम्
कौन किसके साथ है ?
सबका अपना -अपना कारवां
अपनी अपनी मंजिले ...
पर ये जर्र - जर्र शरीर
कहाँ ये सब जानता है ?
बूढ़े कन्धों को तो सहारे की चाह
किसी की हमदर्दी की आस
अब भी है , की काश वो लौट आये
वो छुहन , वो स्पर्श , वो एहसास
फिर से पाने की नाकाम चाह
अपनों से कुछ प्यार पाने की उम्मीद
पर किसके पास है इतना समय ?
न जाने ये इंतजार कब खत्म होगा ?
काश वो भी ये सब जान जाते
कि... समय ही किसके पास है |
गालों तक लुढकते हुए आंसूं
दिल में दर्द को झुपाने की लाख कोशिश
आवाज़ को बनाये रखने का झूठा प्रयास
पर उम्र तो सब कुछ ब्यान कर देता है
विश्वाश ही है जो अभी भी जिन्दा है
दर्द एसा की एक टीस की तरह ...
कब सैलाब बनकर सुनामी का रूप ले ले |
कौन झुकना चाहता है ?
सब अपने मद मैं चूर
सबका अपना - अपना अहम्
कौन किसके साथ है ?
सबका अपना -अपना कारवां
अपनी अपनी मंजिले ...
पर ये जर्र - जर्र शरीर
कहाँ ये सब जानता है ?
बूढ़े कन्धों को तो सहारे की चाह
किसी की हमदर्दी की आस
अब भी है , की काश वो लौट आये
वो छुहन , वो स्पर्श , वो एहसास
फिर से पाने की नाकाम चाह
अपनों से कुछ प्यार पाने की उम्मीद
पर किसके पास है इतना समय ?
न जाने ये इंतजार कब खत्म होगा ?
काश वो भी ये सब जान जाते
कि... समय ही किसके पास है |