सूरज और चंदा


सूरज ने खुद को जो  समेटा है |
शाम ने रात की  चादर को ओढा है |
आसमान में तारों का अब पहरा है |
चाँद ने भी तो चुपके से डाला अपना डेरा है |

देखो फिर से वो हंसी रात आई है |
कितने रंगीन सपने वो साथ लाई है |
जाके देखना जरुर आज उस चाँद को ,
क्या अपने लिए भी , वो  कोई सौगात लाई है |

वो तो रोज़ चांदनी  के संग आता  है |
हमारे सपनों में आके हमें चिढाता  है |
आज हम भी उसकी चांदनी चुरायेंगे |
देखते हैं आज वो कैसे अपनी रात सजाता  है |

हमने भी आज कसम ये खाई है |
चाँद को  चांदनी की कसम दिलाई है |
हम भी  चांदनी को तब तक  न छोड़ेंगे |
जब तक चाँद में  दाग क्यु है , ये न जानेगें |

लो आज फिर से ये बात अधूरी रह गई |
हमारे दिल की बात दिल में दबके  रह गई |
सूरज की किरणों ने भी दस्तक है दे डाली |
आज फिर से चाँद की चांदनी  निगल डाली |`

प्यार ही प्यार


कितनी अजब सी ये बात है |
जीवन के साथ , कैसा ये खिलवाड़ है |
जिसके  एहसास से सृष्टि है खड़ी  हुई |
जिसके क़दमों तले है दुनिया झुकी हुई |
उसी की गिरफ्त से सब है बचना चाहे |
उसके पहलूँ से न बंधना चाहे |
वो खून में चलने  वाली रवानगी है |
वो तो फुल में बहने वाली खुशबु है |
फिर क्यु इसके नाम से इन्सान है कापें |
उसके एहसास को क्यु न समझ पाए |
क्या सबको   इसका ज्ञान नहीं ?
या उसके एहसास का भान नहीं ?
वो  तो निरंतर बहने वाली धारा है |
न बुझने  वाली ज्वाला है |
वो  स्वतंत्र सोच का विस्तार है  |
न कोई रीती , और न ही  रिवाज़ है  |
न  धर्म  , और न ही कोई समाज है  |
हर रूप में खुद को सजाए हुए |
हर वर्ग में अपना साम्राज्य बनाये हुए |
रोको ... तो दुगनी गति से बढता हुआ |
इक मस्त पवन सा उड़ता हुआ |
 वो तो है हर एक गुलशन में ,
भँवरे के प्यारे गुंजन में |
हर एहसास में खुद को गड़ता हुआ |
हर डर से आगे बढता हुआ |
एक मौन  निमंत्रण की भांति |
एक  एहसास को हरदम रचता हुआ |
दिल की धड़कन में बसता हुआ |
उसकी धड़कन उसका  पैमाना है |
उसकी गति ही उसकी  सूचक है |
हवस , जोर , जबरदस्ती 
ये सब इसके नाम नहीं |
समर्पण , सम्मान , विश्वास  
हाँ इससे ही उसका नाता हैं |
शायद इसी से लोग  घबराते हैं ?
इसके  एहसास से दूर हो जाते हैं |
प्यार से खुबसूरत कुछ भी नहीं |
वो तो जीने की एक आशा  है |
सारे कण - कण की अभिलाषा  है |
जो जीवन को गति है देता |
आपस के प्यार को बल देता |
उसके बिन  जीवन नीरस है |
वो इक  दजे  के  पूरक  है  |
सारी सृष्टि में उसका वास  है |
क्युकी प्यार ही सबका संसार है |
हमको  तो  सिर्फ समझना है |
बस उसके  रंग में खुद को रंगना है |

मंजिल कि तलाश


ऐ पथिक ! 
थोडा ठहर , साथ मैं भी चल सकूँ  |
राह में आगे निकल 
मंजिल कि तलाश तक  |
लहरों से डरकर जो तुम 
कश्ती  दरिया में न उतारोगे |
अपने गंतव्य कि दौड़ में 
बहुत पीछे तुम रह जाओगे |
लोभ , लालच कि गर्द में 
डूबा हुआ ये विश्व है |
हिसा - अहिंसा का राह में 
फैला हुआ  समुद्र है |
फूलों की  ख्वाइश जो की  तो 
काँटों पर भी चलना होगा  |
मोती जो तुमको चाहिए 
गहरे सागर भी उतरना होगा  |
सारी  विपदाओं को जीत कर 
आगे तुम जो बड़ते जाओगे  |
थाम लेना हाथ मेरा थककर 
राह में जो तुम रुक जाओगे  |
करना प्रतीक्षा सुदूर भविष्य 
कि गंतव्य  तक |
चलना निरंतर ... धैर्य रख 
मंजिल पाने कि चाह तक |

आवाहन


मैं बढ़ी जा रही हूँ , पर तुम्हें भूली  नहीं हुं |
जल रही हुं पर जलनें से , रौशन  हुई हुं |
ढल रही हुं पर साथ मिलता है समय का |
चल रही हुं पर साथ साया है तुम्हारा |
चाहती हुं , दो पल रुक जाऊ  साथ तुम्हारे |
पर क्या करूँ , असंख्य हाथ है मुझको पुकारे |
पथ में मैं नये चलने जा रही हुं |
पर मैं क्या तुम्हें कभी भुला पा रही हुं |
जानते तो तुम भी हो ,  हर तरफ फैला है क्रंदन |
पर मुँह फेर कर ये तो होगा न कभी कम |
विश्व की ये वेदना कहानी तो नहीं है |
भूख  से बिलखते बच्चों के खून में
रवानी भी तो नहीं है |
शांति कैसे छाए , जब वातावरण में  उदासी भरी हो |
तृप्ति कैसे होगी , जब सृष्टि ही प्यासी पड़ी हो |
ऋण न चूका पायें तो  जन्म लेना भी व्यर्थ है |
यही सोचकर पाँव पथ की और अग्रसर हैं |
सोचती हुं आज कोई गीत ऐसा  गाऊँ   |
भीग जाये ये धरा मैं नीर ऐसा  बहाऊँ  |
मानव होकर मानव की वेदना को जो न जानें   |
व्यर्थ है जीना जो उसकी पीड़ा को  न पहचानें  |
मुझमें और उसमें अंतर तो ऐसा कोई नहीं है  |
मूक हुं तो क्या उसकी व्यथा न पहचानूँ  |
प्यासे पंछी को देख , जब फट सकता है मानव मन |
तो कंकाल होते देख , प्रेरणा क्यु न देता मन |
देखती सुनती मैं रहती हुं ये हर पल |
साथ हुं तेरे न भूली हुं तुझे एक भी पल |