वो काली घनी रात
मुझे अपने आगोश में
यूँ लेती चली गई |
बहुत घनघोर उस रात
वहाँ अँधेरा था |
खुद का साया ही
वहाँ एक अकेला था |
दूर फलक पर एक तारा
चमकता दिख गया |
मेरे होंसलें को वो फिर से
बुलंद कर गया |
अब काली रात का आँखों में
भय कुछ कम था |
बस अब तो वो तारा ही
मेरा हमसफर था |
रात तो सारी उससे
गुफ्तगू में निकल गई |
नीद ने कब आगोश में
ले लिया इसकी तो
देर तक खबर ही न हुई |
सूरज ने कब अपनी हंसी
चादर हमपे डाल दी ?
हम रहे अनजान ....
खामोश रात घटा
बनके उड़ गई |
टिमटिमाता तारा ही
हमें आज जीना सिखा गया |
धीमी सी लो को देखकर भी
आगे बढ़ना बता गया |
मत हारना हिम्मत
किसी भी मुश्किल में
रोशनी खुद बढ़के हमें
गले लगायेगी |
हमारे साथ फिर दूर
तलख जायेगी |