दुनिया कब सिमट गई
खबर ही न हुई |
वो घर के बड़े - बड़े आँगन ,
जहाँ बैठ कर सब
अपनी कहते और सुनते थे
किसी को मनाते
और खफा हो जाते थे |
उसने कब छोटा सा
रूप ले लिया
पता ही न चला |
आँगन पर वो तुलसी का पौधा
बच्चों का चारों तरफ
भागते रहना |
सहेलियों की वो प्यारी बातें
आम की चटनी और आचार
की सदा बहारें
कब सिमट गई
पता ही न चला |
पडोसी का एक दूजे के
लिए वो प्यार ?
एक दूजे के सुख - दुःख
में शरीक होते वो लोग |
रिश्ते - नातों से मिलने के
वो खूबसूरत पल |
कहाँ खो गया
पता ही न चला |
करुणा , दया और सत्कार
जीत की हार
आत्मा का वो विस्तार
कहाँ सिमटता चला गया
पता ही चला |
वो आँगन कहाँ खो गया
पता ही न चला |