खबर ही न हुई


दुनिया कब सिमट गई
खबर ही न हुई |
वो घर के बड़े - बड़े आँगन ,
जहाँ बैठ कर सब
अपनी कहते और सुनते थे
किसी को मनाते
और खफा हो जाते थे |
उसने कब छोटा सा
रूप ले लिया
पता ही न चला |

आँगन पर वो तुलसी का पौधा
बच्चों का चारों तरफ
भागते रहना |
सहेलियों की वो प्यारी बातें
आम की चटनी और आचार
की सदा बहारें
कब सिमट गई
पता ही न चला |

पडोसी का एक दूजे के
लिए वो प्यार ?
एक दूजे के सुख - दुःख
में शरीक होते वो लोग |
रिश्ते - नातों से मिलने के
वो खूबसूरत पल |
कहाँ खो गया
पता ही न चला |

करुणा , दया और सत्कार
जीत की हार
आत्मा का वो विस्तार
कहाँ सिमटता चला गया
पता ही चला |
वो आँगन कहाँ खो गया
पता ही न चला |



अब क्या मैं लिखूं


आज  सोचा फिर , मैं कुछ और लिखूं |
फिर बोला दिल , अब क्या मैं लिखूं |

किसी गीत के कोई बोल लिखूं |
या दिल की  ऐसी बात लिखूं |

अपने सपनों की सौगात लिखूं |
या ओरों के  ज़ज्बात लिखूं |

कुछ उनकी सुनूं या समझाऊँ |
या ऐसे ही आगे मैं बढ़ जाऊँ |

सूरज की किरणों की सौगात लिखूं |
या आसमान  का विस्तार लिखूं |

उन बीते लम्हों की बात लिखूं |
या अब जो है अपने पास लिखूं |

मैं कृष्ण की लीला का अंदाज़ लिखूं |
या पुरषोतम राम का त्याग लिखूं |

मैं हँसते बच्चे की किलकार लिखूं |
या ढलते यौवन के जज्बात लिखूं |

मैं  सावन की वो फुहार लिखूं |
या रिमझिम बारिश की रात लिखूं |

आज तुम ही बताओ अब मुझसे  ,
की मैं फिर से किसकी बात लिखूं |

मेरा भारत महान


मानव का मानव के भीतर जब न हो सम्मान ,
फिर कैसे फूटेगा  मुख से कोई सुन्दर गान |

चारों तरफ जग में फैला हो जब घोर अंधकार ,
तो करो विनय सूरज से करवा दे सुबह का भान |

खिंच दिलों में मानव के , कड़ी कर दो ऐसी  दीवार ,
करो  कुछ ऐसा  कि करें सब एक दूजे को स्वीकार |

तुम ही देश के रखवाले , तुम ही हो पहरेदार ,
तुम हो देश के रक्षक , तुम से ही तो है सरकार |

करो कुछ ऐसा  कि पलने लगे सबके दिल में प्रीत ,
सबकी  वाणी  गाने  लगे जन - गन - मन का गीत |

देखो बदनाम न करना  दोस्ती कि ये  रीत ,
कोई तुमसे ये न कहे  कैसे हो तुम मेरे मन मीत |

जागो भारत जागो ये अपने देश कि  है प्यारी पुकार ,
हो जाओ मिलकर एक जो है तुमको भी इससे प्यार |

न रहे कोई दुश्मन भर दो सबके दिल  में संगीत ,
सब  इसमें में ही खो जाये न रहे राग - द्वेश का गीत

आस फिर भी है बाकि


इतना डर
इतनी बैचैनी
क्यु डरती हो ?
किससे डरती हो ?
यही तो है वो हिंदुस्तान
जिसमें ऊँची - ऊँची
पर्वतमालाएं बिखरी पड़ी हैं |
बर्फ से ढकी चोटियाँ
कल - कल बहते झरनें
सब अपनी जगह पर हैं |
फूलों से लदी वादियाँ
हाथ फैलाये तेरे दीदार को खड़ी हैं |
पर तुम्हारी आँखों का दर्द
इन्हें धुन्दला कर रहा है |
देश में फैली ये दहशत
आँखों की जुबां से बता रहा है |
दंगों से आहात जन - जन की
दास्ताँ सुना रहा है |
की सच में
बेख़ौफ़  नहीं हैं गलियां |
खेत खलियानों में
हर जगह
डरे सहमें से हैं लोग |
तुम्हारा डर हवाओं से
कुछ इस तरह से कह रहा है |
सुनो , देखो मुझे यूँ न छुओ
तुम्हारी छुअन भी
मुझे डराती है
तेरे साथ न होने का
एहसास सा दिलाती है |
फूलों की खुशबूं में भी
अब बारूद की महक आती है |
इन आँखों को
आज भी उसी एहसास का
इंतज़ार है |
सबको अपना हक मिले |
सबको अपना रूप मिले |
सारी  प्रकृति खुशनुमा हो जाये |
इन सब एहसासों के बीच
आज भी आस बाकि है |
मैं जानती हूँ
वो दिन फिर से
पलट कर आएगा |
जब हवाओं का स्पंदन
मुझे फिर से
मदहोश कर जायेगा |
सारा जन जाग उठेगा
ये मेरा देश मेरा देश गायेगा |