आवारापन उसका
न जाने क्यु भाता है मुझे |
वो चुपके से मेरे कानों में
कुछ कहकर निकल जाता है |
उसके आने से सारे आलम
एक मस्ती सी छा जाती है |
बेशक वो पल भर के लिए
ठहर कर चला चला जाता है |
मदहोश सांसे उसकी
हमें बेकरार कर जाती हैं |
न जाने वो किस गली से
ये सब समेट कर लाता है |
पर हमको तो अपने रंग
में वो तब भी रंग जाता है |
उसके रूप को मैंने ...
कभी करीब से नही देखा |
पर उसका एहसास तन - बदन में
बिजली सी दौड़ा जाता है |
बहुत बार चाहा
बढकर मैं रोक लूँ इसे |
पर उसकी आवारगी को
मैं कहाँ रोक पाती हूँ |
उसके एहसास को जान कर
मैं उसके होने का पता लगाती हूँ |
उसके आस्तिव का पता
आजतक कहाँ लगा पाई हूँ |
कभी मंद - मंद कभी
तूफान बनकर वो
अपना परिचय बतलाता है |
उसके आते ही मीठा सा एहसास
और जाते ही फिर .......
आने कि आस लगाती हूँ |