सुनो हम चलेंगे साथ मिलकर के ऐसे |
ऊपर गगन में बादल विचरतें हों जैसे |
तुम देखना वो मिलन होगा ही ऐसा |
किसी ने अब तक न देखा हो जैसा |
सागर की लहरें भी थम जाएँगी ऐसे |
उनके मिलन की जुगत लगाती हो जैसे |
खुद की लहरों को खुद में समेटेगी ऐसे |
क्षितिज पर देख मिलन ठहरी हो जैसे |
सारी कायनात थम जायेगी फिर ऐसे |
उनके मिलन का जश्न मनाती हो जैसे |
भंवरों की गुंजन तब गीत गायेगी ऐसे |
खुद के होने का संकेत दे रही हो जैसे |
पंछी की उड़ानें भी थम जायेगी ऐसे |
पैरों में उनके जंजीरे डाली हों जैसे |
नदिया की कलकल शोर मचायेगी ऐसे |
सागर से मिलने को हो वो भी बैचेन जैसे |
ये मिलन बस एक कल्पना नहीं है |
धरा और गगन का अहसास भी है |
उसके मिलन से सृष्टि थम जायेगी |
तभी तो क्षितिज पर वो मिलते है ऐसे |