आँगन की खोज थी मकान मिल गया |
नया शहर तो बिन आँगन के बन गया |
देखो घर कितनी जल्दी है सिमट गया |
रिश्तों की गर्माहट को भी न सह सका |
झरोखों से अब कोई यहाँ झांकता नहीं |
झत जैसी चीज़ का तो नामोनिशां नहीं |
अपने - अपने जेल में सब कैद हुए है ऐसे |
अपने गुनाह की सजा सब मंजूर हो जैसे |
बाहर की दुनिया से कोई सरोकार ही नहीं |
घर में रहता है कौन इसकी भी खबर नहीं |
तमाशाइयों सी जिंदगी है बनके रह गई |
सबकी आपस में ही है जोरदार ठन गई |
अब किसीसे किसीको न कोई गिला रहा |
जीने का नया सिलसिला जो है चल पडा |
अब इंतहा भी एक हद से है गुजरने लगी |
लो तारीखे अंत अब करीब है आने लगी |