क्या है ये सुकून



कैसी होती है ...ये सुकूने जिंदगी 
भूखे बच्चे को रोटी का निवाला 
खिलाकर देखो |
फिर भी न आये दिल में कोई अहसास ...
टपकते उसके आंसूंओं को
अपनों के साथ महसूस करके देखो |
मन जो महसूस कर रहा है

यही जिन्दगी का राज़ है
खुदा कि रहमत का 

ये जीता जागता कमाल है
मंदिर मस्जिद में जाने की
अब जरूरत ही न रही |
भूखे बच्चे के चेहरे में 

इबादते सुकून जो दिख गया |
फिर किसको खोजते फिर रहें हैं
हम भटक - २ कर दर - बदर ...
ऐसी सुकूने इबादत तो
हर गुजरते राह में देखो |
वो तो परख रहा है
हर रूप में पल - पल हमें |

बस उस अहसास को 
खुद में उतारकर कर देखो |

रिश्ते


खुली आँखों से जब देखा
जिंदगी भुरभुरा रेत का
एक टीला सा लगी
जो कभी बहुत गर्म
तो कभी ठंडी हो जाती
कभी लहरें बहा ले जाती
तो कभी तेज आंधियां
अपने संग उड़ा ले जाती
उस  रेगिस्तान कि तरह
जहां सिर्फ धसना
और सिर्फ धसना है
हरपल  हाथ से फिसलता हुआ
रिश्तों कि मजबूत डोर
जिसे थामे रहती
लहरों के थपेडों से बचाती
तेज आँधियों से संभालती
टूटे घरोंदों को फिरसे जोड़ती
मजबूत बाहुबल में जकड़े हुए
अपने जीने  को साकार करती
पर असल जिंदगी तो ...
इंसा के जहन  में है पलती
हर वक्त गोते लगाते हुए
उथल - पुथल करती हुई
भावनाओं को अपने में सजाती हुई
हर वक्त मकडजाल बुनकर
अपने जीवन को दिशा देती
सबसे दूर सिर्फ अपने आप में  ...
जिसकी किसी को कोई खबर नहीं
पर रिश्तों कि डोर उसे टूटने न देती |

है इंसा कि शिकायत कि मुझको कुछ नहीं मिला



हर बज्म में बैठे और खुदको साबित भी कर लिया |
फिर भी रही शिकायत की  हमको कुछ नहीं मिला |

चोखट को अपनी छोड़कर अरमान दिल में ले चले |
पर इतने बड़े जहां में भी कोई अपना सा न मिला |

दिल थाम कश्ती को तूफान के हवाले था कर दिया |
सागर के गर्भ में उतर कर भी हमें कुछ नहीं मिला |


काली अँधेरी  रातों में चाँदनी ने पूरा साथ था दिया |
जिसकी थी दिल में ख्वाइश उसका ही न पता मिला |

इसका - उसका करके खुद के हिस्से में दर्द था लिया |
दर - दर कि ठोकर खाकर भी हमको कुछ नहीं मिला |

ख्वाइश का था ये दिलकश सफर तो वो कैसे हार जाती |
अंधा होता है ये सफर इसलिए इंसा को कुछ नहीं मिला |

बहती नदिया


कब हुई विमुख मैं 
अपने किसी कर्तव्य से |
बह रही हूँ आज भी 
कल - कल के उसी वेग से |
बच - बच के आज भी चलती 
पत्थरों के प्रहार से ... |
कर रही हूँ सबका पोषण 
आज भी उसी सम्मान से |
ऊँचे - ऊँचे पर्वतों को
भेंद्ती में चल रही |
कठिन रास्तो को पार कर 
आगे ही आगे बढ़ रही |
कभी चंचल , कभी कलकल 
कभी भयावह रूप धर - धर के ,
चलती हूँ धरा की गोदी में 
जन - जन की प्यास बुझाने तक |
मिलकर आज जो सागर में 
अपना मैं आस्तिव गंवाती हूँ |
उठकर उसी की गोदी से 
अपना आस्तिव फिर में पाती हूँ |