एक अधूरी आस



हर बार कौडियों के भाव बिकता है 
उसका अनाज |
दिन - रात के सुंदर सपने पल भर में 
धाराशाही हो जाते हैं |
उसके कपडे से उठती वो मिटटी की गंध
कही जाकर खो जाती है |
वो जीवित होकर भी एक जिन्दा लाश
बन जाते हैं |
अपनी मेहनत का सही दाम न मिलाना ...
उनके बुलंद मंसूबों में पानी फेर देते हैं |
वो अपने ही हाथों अपनों का गला घोंटने पर
मजबूर हो जाते हैं |
सब कुछ देने का झूठा आश्वासन देकर
कुछ न मिलना |
पंछी के पर काटकर जीने को छोड़ देना
जैसा ही तो है ,
परिणाम वही जो अक्सर होता है |

आत्महत्या ...
यहाँ आत्महत्या को हत्या का रूप कहा जाये
तो क्या गलत होगा ?
हाँ इसका निवारण है पर ये आवाज अगर
उन कानों तक पहुंचे ...
जिनका कहना है कि हम तक बात पहुँचती ही नहीं
बेचारे ... कितने बेबस है वो लोग ( सरकार )

उनकी बेबसी उन्हें कुछ करने ही नहीं देती |
वर्ना शायद ये दशा किसानों कि कभी न होती |

नारी अबला नहीं



तेरी पहचान को लोग , नाम देने लगे हैं |
तेरे लहराते आँचल को , सलाम देने लगे हैं |
तेरे मुस्कुराने से ही तो , मुस्कुरानें लगी है हर शय |
तेरे जोश को देखकर , रिश्तों में निखर आने लगे हैं |
जब तू कमर कसती है , तो थम जाती है दुनिया |
तेरे सजदों के आगे अब , दुनिया झुकने लगी है |
तेरे नाम से ही अब नया इतिहास , रचा जायेगा |
पहले कहते थे ....  अबला जीवन तेरी यही कहानी |
अब आग से भी परिचय सभी का हो जायेगा |
स्वर्ण अक्षरों से हर उपलब्धि में ,
तेरा नाम लिखा जायेगा |
हाँ नारी है तू , आदिशक्ति है तू ,
इसी आत्मविश्वास और हिम्मत की दास्ताँ को
हर शख्स बारी - बारी से अब दोहराएगा |

अंदाज़ अपना - अपना

 

मुस्कान ही हमेशा कुछ नहीं कहती |
आवाज से हर बात बयाँ नहीं होती |
अहसास आंसूंओं से भी बयाँ होते हैं |
उनकी भी अपनी एक जुबाँ होती है |
मन को गुदगुदाती खुशी हो ...
या हताश के हों पल |
आशा की आहट हो या ...
फिर आकांशा की हो धमक |
भय से डरकर ...
या सुख में रमकर ...
हृदय की गोद से ...
एक बूंद आँखों में आती है |
आँखे तो हर हाल में छलक उठने को ...
बेकरार सी हो जाती हैं |
हाँ भाव ही तो है जो धरते हैं झट से
आँखों में एक तरल रूप |
जो आंसू बनकर हर बात बयाँ कर जाते हैं |

उम्मीद बनाये रखें



कौन जाने , कब , कहाँ कोई , राह भूल जाएँ |
अपनी उम्मीदों की शमां को , जलाये रखिये |

बारिशे तो आती - जाती है तूफ़ान गुजर जातें हैं |
बस अपने पाँव को जमीं में जमा कर रखिये |

घर की ये बात है निकले न घर से बाहर |
आप बस खिड़की दरवाजों को बंद रखिये |

बैठे रहे कोहनी टिकाये गाल पर कब तलक |
इंतज़ार में दरवाजें की दस्तक का ख्याल रखें |

हालें दिल अब तो बयाँ हो जाता है आँखों में |
मैं न कहती थी पानी है आँखों को बंद रखिये |

देर तक गरजते बादलों का शोर सुनने पर  |
भीड़ का हिस्सा बने रहने से परहेज रखिये |