अपने परिचय से अनजान


सबका परिचय पाना चाहता है दिल 
खुद अपने परिचय से घबराता है दिल 
कितना झूठ , कितना धोखा , कितनी बईमानी
है हममे ........
हाँ इस पैमाने को अच्छे से जानता है दिल 
शायद इसलिए खुदको मिलने से घबराता है दिल 
मंदिर में जाता है ...
मस्जिद में भी जाता है ...
गीता और कुरान में भी दिल लगता है 
पर अकेले बैठने से बहुत घबराता है दिल 
इंसान से मिलता है ...
ईश्वर को पाना चाहता है ...
पर खुद से मिलने से अक्सर डर जाता है ये दिल
क्युकी खुद को बहुत अच्छे से जानता है दिल
हाँ इसीलिए यहाँ - वहाँ भागता फिरता है दिल |

एक अधूरी आस



हर बार कौडियों के भाव बिकता है 
उसका अनाज |
दिन - रात के सुंदर सपने पल भर में 
धाराशाही हो जाते हैं |
उसके कपडे से उठती वो मिटटी की गंध
कही जाकर खो जाती है |
वो जीवित होकर भी एक जिन्दा लाश
बन जाते हैं |
अपनी मेहनत का सही दाम न मिलाना ...
उनके बुलंद मंसूबों में पानी फेर देते हैं |
वो अपने ही हाथों अपनों का गला घोंटने पर
मजबूर हो जाते हैं |
सब कुछ देने का झूठा आश्वासन देकर
कुछ न मिलना |
पंछी के पर काटकर जीने को छोड़ देना
जैसा ही तो है ,
परिणाम वही जो अक्सर होता है |

आत्महत्या ...
यहाँ आत्महत्या को हत्या का रूप कहा जाये
तो क्या गलत होगा ?
हाँ इसका निवारण है पर ये आवाज अगर
उन कानों तक पहुंचे ...
जिनका कहना है कि हम तक बात पहुँचती ही नहीं
बेचारे ... कितने बेबस है वो लोग ( सरकार )

उनकी बेबसी उन्हें कुछ करने ही नहीं देती |
वर्ना शायद ये दशा किसानों कि कभी न होती |

नारी अबला नहीं



तेरी पहचान को लोग , नाम देने लगे हैं |
तेरे लहराते आँचल को , सलाम देने लगे हैं |
तेरे मुस्कुराने से ही तो , मुस्कुरानें लगी है हर शय |
तेरे जोश को देखकर , रिश्तों में निखर आने लगे हैं |
जब तू कमर कसती है , तो थम जाती है दुनिया |
तेरे सजदों के आगे अब , दुनिया झुकने लगी है |
तेरे नाम से ही अब नया इतिहास , रचा जायेगा |
पहले कहते थे ....  अबला जीवन तेरी यही कहानी |
अब आग से भी परिचय सभी का हो जायेगा |
स्वर्ण अक्षरों से हर उपलब्धि में ,
तेरा नाम लिखा जायेगा |
हाँ नारी है तू , आदिशक्ति है तू ,
इसी आत्मविश्वास और हिम्मत की दास्ताँ को
हर शख्स बारी - बारी से अब दोहराएगा |

अंदाज़ अपना - अपना

 

मुस्कान ही हमेशा कुछ नहीं कहती |
आवाज से हर बात बयाँ नहीं होती |
अहसास आंसूंओं से भी बयाँ होते हैं |
उनकी भी अपनी एक जुबाँ होती है |
मन को गुदगुदाती खुशी हो ...
या हताश के हों पल |
आशा की आहट हो या ...
फिर आकांशा की हो धमक |
भय से डरकर ...
या सुख में रमकर ...
हृदय की गोद से ...
एक बूंद आँखों में आती है |
आँखे तो हर हाल में छलक उठने को ...
बेकरार सी हो जाती हैं |
हाँ भाव ही तो है जो धरते हैं झट से
आँखों में एक तरल रूप |
जो आंसू बनकर हर बात बयाँ कर जाते हैं |