अंदाज़ अपना - अपना



बड़ा दिलकश सा अंदाज़ , है ये तेरा
बातों - बातों में हमको , रिझाना तेरा |

कभी पलकें झुकना , कभी पलकें उठाना
ये आँखों- आँखों में ही मुस्कुराना  तेरा |

जुबाँ से कुछ न कहना , बस खामोश रहना
ये वजह - बेवजह यूँ हमको सताना  तेरा |

कभी दूर हमसे जाना कभी पास मेरे आना
ये बात - बात पर यूँ इतराना तेरा |

चल छोड़ ये नजाकत कहीं कर न दे बगावत
ये रह - रहकर हमपे सितम ढाना तेरा |



आह और वाह है ये जिन्दगी


उम्र कि दहलीज पर सरपट आगे दौड़ती |
उलझनों को सुलझा कर राह को मोड़ती |

एक साँस ,एक आस और  एक विश्वास |
हरेक के जीने का मकसद ही कुछ खास |

कौन समझ पाया इसके मुकम्मल मायनें |
कभी ठहरी , कभी भागती इसके हैं बहानें |

हर नाकामयाबियों के बाद बंद मुठ्ठी खोलती |
एक शक्ति , एक विश्वास का संचार घोलती |

हर संघर्ष के बाद उल्लास का नाम जिन्दगी |
हर ख़्वाब को हकीकत का नाम देती जिन्दगी |

अपने परिचय से अनजान


सबका परिचय पाना चाहता है दिल 
खुद अपने परिचय से घबराता है दिल 
कितना झूठ , कितना धोखा , कितनी बईमानी
है हममे ........
हाँ इस पैमाने को अच्छे से जानता है दिल 
शायद इसलिए खुदको मिलने से घबराता है दिल 
मंदिर में जाता है ...
मस्जिद में भी जाता है ...
गीता और कुरान में भी दिल लगता है 
पर अकेले बैठने से बहुत घबराता है दिल 
इंसान से मिलता है ...
ईश्वर को पाना चाहता है ...
पर खुद से मिलने से अक्सर डर जाता है ये दिल
क्युकी खुद को बहुत अच्छे से जानता है दिल
हाँ इसीलिए यहाँ - वहाँ भागता फिरता है दिल |

एक अधूरी आस



हर बार कौडियों के भाव बिकता है 
उसका अनाज |
दिन - रात के सुंदर सपने पल भर में 
धाराशाही हो जाते हैं |
उसके कपडे से उठती वो मिटटी की गंध
कही जाकर खो जाती है |
वो जीवित होकर भी एक जिन्दा लाश
बन जाते हैं |
अपनी मेहनत का सही दाम न मिलाना ...
उनके बुलंद मंसूबों में पानी फेर देते हैं |
वो अपने ही हाथों अपनों का गला घोंटने पर
मजबूर हो जाते हैं |
सब कुछ देने का झूठा आश्वासन देकर
कुछ न मिलना |
पंछी के पर काटकर जीने को छोड़ देना
जैसा ही तो है ,
परिणाम वही जो अक्सर होता है |

आत्महत्या ...
यहाँ आत्महत्या को हत्या का रूप कहा जाये
तो क्या गलत होगा ?
हाँ इसका निवारण है पर ये आवाज अगर
उन कानों तक पहुंचे ...
जिनका कहना है कि हम तक बात पहुँचती ही नहीं
बेचारे ... कितने बेबस है वो लोग ( सरकार )

उनकी बेबसी उन्हें कुछ करने ही नहीं देती |
वर्ना शायद ये दशा किसानों कि कभी न होती |