सिर्फ एक गुजारिश




बादलों में आज फिर एक शोर हुआ |
बादल बारिश बन धरा से मिलने उतरी | 
रिमझिम बूंदों के कोमल स्पन्दन से ...
धरा की कोख में फिर एक अंकुर फुटा |
सुन्दर कोमल कली के जन्म के साथ ...
माँ ने सुन्दर एक रचना को आकर दिया |
प्यार , दुलार और संरक्षण पाकर |
पौधे ने अब पेड़ का है रूप लिया  |
फल , फूल छाया को खुद में सजा ...
फिर से सृष्टि कि रचना को तैयार किया |
फिर नारी शब्द से इतनी नफरत कैसी ?
स्त्री के बिना जो होगी वो कुदरत कैसी ?
उसके बिना तो हर श्रृंगार ही अधूरा है |
उसके बिना प्रेम का न कोई पाठ पूरा है |
शक्ति बिना शिव का आस्तित्व ही नहीं |
बिन राधा के कृष्ण का हर रास अधूरा |
सहनशीलता , सृजन का पर्याय है नारी |
धडकनों में चलने वाली रवानगी है नारी |
उसके बिना सृष्टि की हर रचना अधूरी |
सोचो - २  बिन कन्या के कोई बात कैसे हो पूरी ?
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रंगों कि फुहार




रंगों कि फुहार है
बसंती रुत कि बहार है |
कोयल भी देखो गा रही
रह - रहकर राग मल्हार है |
दिशाओं से गूंज रहा
ता - ता थैया का ताल है |
हर आलम  है थिरक रहा
प्रभु कि लीलाओं का चमत्कार है |
हिरणों कि मस्त छलांग में
कस्तूरी पाने कि आस है |
सूरज कि निश्छल किरणों में ,
एक अपनेपन का अहसास है |
झरनों कि कलकल धारा में
समर्पण करने कि प्यास है |
पर्वत कि ऊँची चोटियों में
सुरक्षा का एक आभास है |
ये जो सतरंगी रंगों कि
छा रही छटा मनुहार है |
ये मेरे देश में लोगो का
आपस का प्यार - दुलार  है|

एक झूठी उम्मीद

 

सुना था 
उस गांव में अब 
कोई नहीं रहता |
टिमटिमाती लौ में 
एक साया अक्सर 
दिखाई है देता |
किसका है वो अपना
जो गश्त वहाँ लगता है ?
अपने तो कहते हैं वहाँ
अब वहाँ सन्नाटों ने 

घर बसाया है |
वो लाठी , वो चश्मा
वो झुकी झुकी सी देह 

किस गुजरे पल  की 
दास्ताँ है कह रही ?
बंजर पड़ी धरती को
निहारकर कर वो क्यु
उसके लहलहाने का
इंतज़ार है कर रही |
शायद अपनों को
इस बात का अब
इल्म ही नहीं  |
कि आज भी ...उनकी जननी
अपनों के लौट आने की
आस में है जी रही |

दोषी कौन



खबर पढ़ी थी मैंने 
वो मर गया ...
फांसी लगाई थी उसने 
पर लोग कहते थे 
कुछ परेशान सा था वो
बहुत गलत किया उसने
साबित भी हो गया
कि ये आत्महत्या थी
और कानून कि नज़र में
ये एक जुर्म है
तो क्या इसका
जिम्मेदार वो खुद है ?
खुशी , दर्द , छटपटाहट
ये सब अपने बस में कहाँ ?
मजदूरो को कारखानों में
काम न मिलना |
किसानों को उनकी उपज का
सही दाम न मिलना |
बुनकर का करघा
हथिया लेना |
क्या इन सब में
किसी कि भी साझेदारी नहीं ?
क्या ये बिना हथियार के
दिए गए मौत के बराबर नहीं ?
फिर इस जुर्म का
वो अकेला भागीदार ?
सवाल तो और भी हैं
पर कहें तो किससे कहें हम 

चलो आज फिर खामोश ही रहे हम |