नारी



धैर्य है स्फूर्ति है ,
ममता की मूर्ति है ,

शक्ति स्वरूपा है ,
प्रेम की प्रतिरूपा है ,

उर्जा की खान है ,
बच्चों की जान है ,

विज्ञान से नाता उसका ,
अंतरिक्ष भी भाता उसको ,

पति का वो मान है ,
विश्व की वो शान है ,

प्रकृति की शक्ति है ,
स्नेहमयी जननी है |

सत्य से परिचय




सुबह का सूरज शाम को ...
छत की मुंडेर से , फिसलता हुआ ,
आंगन में जो ठहरा |
पूर्व से दामन छुडाता हुआ ,
पश्चिम में जा उगा |
जीवन के पहलूँओं को समझना ,
इनता भी मुश्किल नहीं |
जीवन का सत्य , जीवन देकर
लम्हा - लम्हा समेटते जाना है |
हमारी उपलब्धियां , हमारे जीने का ठंग
जिंदगी सब कुछ धीरे - धीरे समझा देती है |
जुड़ते जाते हैं जैसे - जैसे संबंधों के डोर से ...
छुटना लाजमी है , ये बात बखूबी जहन में डाल देती है |
अकेले थे अकेले ही हमको जाना है ...
विधि का विधान पल - पल समझाती रहती  है |
फिर रह जाता है सिर्फ एक खाली शरीर
अकेला जर्जर हिलता हुआ ...
तब हाथ बढाकर दूर खड़े समय को
हमारा हाथ थमा देती है |

इससे भले तो हम पहले थे



बहुत अरसे बाद गली के नुक्कड़ में
हमें मिली थी वो |
शानों शौकत से लबरेज ,
गाड़ी से अभी - अभी उतरी थी वो |
हमें देखते ही तपाक से गले मिलने लगी |
जैसे  कैद से किसी पंछी को
कुछ वक्त उड़ने की इज़ाज़त मिली |
मेरी क्या सुनती , वो तो अपनी ही कहने लगी |
ऐसा लगा माँनो बरसो बाद , फिर वो बहकने लगी |
हमने भी हाथ में मोबाइल देख
चुटकी लेते हुए बात को पलटना चाहा |
उसकी बात को रोक फिकरा एक कसना चाहा |
लगता है आजकल , सारे जहाँ से जुडी हो ?
किसी और की नहीं , सिर्फ अपनी ही सुनाती हो ?
बस इतना सुनते ही वो रुआंसी सी होने लगी  |
खिलखिलाहट के बीच ,
उदासी की झलक साफ़ दिखने लगी  |
मोबाइल को देखते हुए , बस इतना ही कहने लगी |
इससे भले तो हम पहले थे  ...
दोस्तों के बीच जाकर हँसते - बोलते तो थे |
अब तो इसकी ट्रिन - ट्रिन से ही माहोल बिगड जाता है |
रांग नम्बर होने पर भी सवाल खड़ा हो जाता है |
और क्या कहूँ  ? ये तो बस मेरी सुरक्षा का एक बहाना है |
कही दूर होने पर पूरी घटना का ब्यौरा जो सुनाना है |



पुरस्कार कैसे दिए जाते हैं



कोई पुरस्कृत कैसे होता है ?
जैसे कोई जिंदगी भर बिना इनाम के
इनाम वाला बनता है |
वैसे कुछ लोग बिना नाम के भी ,
इनाम बटोरते रहते हैं |
तो कुछ नाम ऐसे भी हैं ,
जो इनाम की शक्ल ही , बदल देते हैं |
वे लेते हैं... तो खबर बनती है |
ठुकराते हैं.. तो खबर बनती है |
क्युकी ...  जो धूर्त होते हैं
वो ... बहुत मीठे होते हैं |
और मीठे फलो मै कीड़े भी जल्दी होते हैं |
तो बस उनकी मुस्कराहट को ही
तय करने दो .......?.
की  मुस्कान उनकी कितनी निर्दोष है |
और फिर वो  मिले , तो जानो
की उनकी आँखों में , चमक कितनी है  ?
आखिर में बस इतना कि मीठा  न मिले तो...
नमकीन से काम चलेगा ?
आजकल तो जेबकतरों और
उठाई -गीरों को भी इनाम
दे दिए जाते हैं |
तो अब हम कैसे ये तय करे की ...
पुरस्कार कैसे दिए जाते हैं ?