एक अनबुझ पहेली


जवाब दिया तब , जब बात बेवजह की होने लगी  ,
चर्चा जब देश पर हुई तो फिर पन्ने पलटने लगी  |

बेफिक्र घरों में बैठ गुफ्तगू यहाँ - वहां की होती रही ,
सरहद में चली गोलियां तो माँ की कोख उजडने लगी  |

क्या कीमत है देश में किसी शहीद - ए - जवान की ,
कोई कैसे कुछ कहे तोपों की सलामी जो मिलने लगी |

बिगड़ रहा है माहौल या गुंजाईश  बची है सुधरने की ,
सब हो गये है भ्रष्ट या इंतजार की तारीखें बढ़ने लगी |

बात - बात पर बात तो अक्सर इबादत की होती रही
दिल जब जिद्द पर अडा आबरू औरत की लुटने लगी |


मौसम

Photo: मौसम 
 
फिर जवां होगी  , नई बयार 
पेड़ - पौधों से होकर अंगीकार 
नई कोंपले सर उठायेंगी 
नया किरदार फिर निभाएंगी 
पतझड़ दिल दुखायेगा 
पेड़ों से पत्ते उड़ा ले जायेगा 
हवा भी करतब दिखायेगी 
टूटे - तिनकों को बिखरा जाएगी  
ये नित नया रंग बदलता मौसम 
धुल - मिटटी में सनकर
धरा के सीने को चीरकर  
बारिश की बूंदों से प्यास बुझाकर 
सूरज की रौशनी में तपकर 
इंसा की भूख है मिटाता ,
इंसा का पेट है भर जाता |

फिर जवां होगी , नई बयार 
पेड़ - पौधों से होकर अंगीकार 
नई कोंपले सर उठायेंगी 
नया किरदार फिर निभाएंगी
पतझड़ दिल दुखायेगा
पेड़ों से पत्ते उड़ा ले जायेगा
हवा भी करतब दिखायेगा 
टूटे - तिनकों को बिखरा जाएगा
ये नित नया रंग बदलता मौसम
धुल - मिटटी में सनकर
धरा के सीने को चीरकर सर उठाएगा
बारिश की बूंदों से प्यास बुझाएगा
सूरज की रौशनी में तपकर ...
इंसा की प्यास भी मिटाएगा
इंसा का पेट भरता जायेगा |

सफ़र




किस कदर दोहरी संस्कृति है ये
जहां तात्कालिक लाभ हो
वहां हम आधुनिक ...
वैसे पूरी मनोरचना में पुरातन
क्या तुम्हे नहीं लगता ?
हाँ कुछ ऐसे ही तो
जीवन बसर करते हैं हम लोग
सत्य को खोजने के लिए हमने
सुविधापरस्ती से सम्बन्ध बनाया है
हमारी मूल समस्या यही है
सत्य की खोज ...
पर न जाने उस सफर का आरम्भ
कब होगा ?
अब तक तो पुराने और नये के बीच में
एक दंद्न्द भर है
न पुराना पूरा और अब भी अधुरा
सफर जारी है ...
एक खुबसूरत मंजिल की तलाश को लेकर |

पल - पल बदलता वक़्त



लम्हा - लम्हा जिंदगी कुछ यूँ सिमट गई ,
जो मज़ा था इंतजार में अब सज़ा बन गई |

दर्द और ख़ुशी के बीच दूरियां जो बड गई ,
दिलो के दरमियाँ मोहोब्बत कम हो गई |

चिठ्ठी - तार बीते जमाने की बात हो गई ,
आधुनिक दौड़ में वो बंद किताब हो गई |

कुछ सवाल हदों की सीमाएं पार कर गई ,
वक़्त के साथ अपने कई निशां छोड़ गई |

खफा नहीं , जिंदगी हमपे मेहरबान हो गई ,
भडास निकली तो बात आई - गई हो गई |