सबक



हर तरफ शोर सुन धरा ने निर्णय था लिया ,
बादलों को बगावत का प्रस्ताव लिख दिया |

उमड़ - घुमड़ के शोर ने हर शोर को दबा दिया ,
मूक तांडव ने इंसानी ज़ज्बातों को जगा दिया |

ऐसे भिगोया धरा को की लहुलुहान कर दिया ,
हर तरफ दर्द का भयंकर सैलाब ही ला दिया |

चीख - पुकार ने मानव मन को दहला दिया ,
तब - तक बादलों ने अपना काम कर दिया |

सबक सीखाने को धरा ने था ये काम किया ,
बादलों ने प्रकृति का रोष ही बयाँ कर दिया |

" खुदा का कहर "



धू - धू कर बेख़ौफ़ जलने लगी लाशें ,
धर्म के नाम पर जहां होती थी बातें |

अब बताओं न ...
क्या होती है ये श्रद्धा ?
किसे कहते हैं धर्म ?
मंदिर , मस्जिद की चौखट में बैठकर 
एक २ श्लोक पर पैसों की बोली ?
बेसहारों पर अत्याचार ?
सब गुनाहों का हिसाब तो है यही ...
फिर किस बात की है मनाही ?
सृष्टि का लिखा कब है बदलता
न खुदा है रोक सकता ...
न पैसा ही काम आता ...
फिर किस बात पर अकड़ना ?
क्यों बे - वजह का भटकना ?
कब कहता है खुदा
दूर चलकर मेरे पास आओ ?
कब कहता है खुदा
मुझ पर पैसा बरसाओ ?
अपनी - अपनी सहूलियत से
भगवान् को बेच हैं डालते ,
जब संभले न संभलता
तो " खुदा का कहर " नाम दे डालते |

वो गुमनाम पल



सुनो , 
याद करो न 
वो फुर्सत का पल 
जब हम सिर्फ और सिर्फ 
एक दुसरे के लिए जियें हों ,
जब हमारे बीच में
हम दोनों की बातें हुई हों ,
सच कहूँ ,
मैं तो सोच - सोचकर
थक गई पर ...
याद ही नहीं आया वो पल
जब हम एक दुसरे के लिए जिए हों
हाँ कई बार साथ बैठना हुआ
पर हर बार बीच में ...
तीसरे का ही जिक्र रहा
साथ रहकर भी ...
बस फासला ही बना रहा ,
अब तुम ही याद दिलाओ न
कौन सा था वो लम्हा ?
जब हमने साथ बैठकर
चाँद को निहारा था |
उसकी खूबसूरती में ही सही
चंद किस्से सुनकर
कहकशा लगा था |
सुनो ,
मुझे बताना जरुर ,
मुझे उस पल का इंतजार है
उस पल को महसूस करने की चाह है ,
कई बार पढ़ा है , मैंने किताबों में ,
चन्दनी रात में प्रियतम के साथ बैठकर
चाँद का दीदार सुकून देता है ,
याद रखोगे न तुम , देखो , भूल न जाना
मुझे उस पल को अहसास में है बसाना |
हाइकु 
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तू , मैं पहेली 
संगी साथी सहेली 
चल अकेली |
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जीवन प्यास 
मन में उल्लहास 
मन उदास |
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दिल में आग 
नफरत का राग 
कर दे राख |
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हुआ अँधेरा 
फिर आया सवेरा 
जीवन फेरा |
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गर अल्पज्ञ 
अर्जित करो ज्ञान 
बनो सर्वज्ञ |
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पुरे करेंगें 
दिल के अरमान 
कभी न कभी |
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अँधेरी रात 
जुगनुओं की बात 
सोया संसार |
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