रचनाकार की रचना

Fabulous Nature Pictures
जब - जब बहार है आती |
गम के सारे बादल है ले जाती  |
जब चारों तरफ  सन्नाटा है छाता  |
हमसे वो  कुछ तो  है कह जाता  |
सबके हिस्से का है सूरज |
सबके हिस्से में आते है सुख - दुःख |
फिर क्यु नदिया सी रोती है ये आँखे ...
क्यु नहीं कह देती हंसके सारी बातें  |
बादल बनके बरसकर
फिर क्यु अपना आस्तिव है रचती |
क्यु छाता है ये अँधेरा
किससे मिलने जाता है छुप - छुपकर |
और उगते सूरज की रौशनी में
क्यु शर्माता है वो रह - रहकर |
नदिया की कलकल धारा सा
क्यु बहता है सबका मन |
राह में मिलते फूल - काँटों को
क्यु समेटता है हर पल |
धुल - मिटटी का श्रृंगार करके
क्यु मचलती है ये पवन हरदम |
कभी मंद गति से बढती
तो कभी क्यु ढहा देती है सबकुछ |
हाँ कोई तो  है इसका रचेता
वही करवाता है हमसे ये सबकुछ |


शुभ दीपावली


रुको मत की चलने का वक्त आ गया है |
उठो फिर की संभलने का वक्त आ गया है |
सबक लो दशहरे के दिन से तुम |
की बनके दिखाओ श्री राम से तुम |
बजाया था किसने सच्चाई का डंका |
जलाई बताओ किसने रावण की लंका |
आज भी दुनिया में उसका बोलबाला |
नज़र आता है दाल में आज भी काला - काला |
भरत , लक्ष्मण से नहीं मिलते भाई |
जहां देखो वही है आपस में हाथा - पाई |
अभी भी है कैद सितायें कितनी |
अभी भी आह भरती हैं बेवायें कितनी |
जलाओ तो लंका जुनूं की जलाओ |
अँधेरे दिलों को जरा जगमगाओ |
मिटाओ दिलों से नफरत और भेदभाव |
मोहोब्बत की रस्में सभी को सिखाओ |
चलो मिलकर फिर से प्यार का दीपक जलाओ |

बस कुछ पल

Nature Love Photo Frame

चेहरे से जरा दर्द को , हटा कर तो देख  |
मेरे कहने से जरा , मुस्कुरा के तो देख |

महफूज़ नहीं है यहाँ , कोई भी काफिला  |
तू बदले तेवर , इन हवाओं के तो देख  |

मैं कब से आस की जोत , जला कर हूँ बैठी | 
तू मेरी वफ़ाओं को दिल में , बसाके तो देख |

छोडो उन्हें जो बस्तियों में , बैठे हैं शौक से |
तू खुद के लिए ,एक घर बनाके तो जरा देख  |

क्यु रोता है शहर में होते , सितम को देखकर |
जो हो रहा है खुदके जहन में लाके तो जरा देख  |

पल - पल तेरी याद में ही , बीतता है हर पल |
तू कुछ पल को मेरे दिल में भी , झाँक के तो देख |

तुझे कसम है इस मासूम से , दिलो - जान की |
मेरे साथ भी  एक बार , वफा निभा के तो देख |

नई सुबह

 
घर के आँगन में ठहरती
वो धूप की लालिमा
दूर क्षितिज के पार ...
रात की चादर मुझपर ड़ाल
दूर जाती हुई |
चाँद मुस्कुराता हुआ
तारों की बारात संग खुद को
संवारता  हुआ ...
अपनी डोली में बैठकर
अँधेरी रात सजाने निकल पड़ा |
रात दुल्हन की तरह सजी
लाज  से खुद को समेटे
चाँद के इंतज़ार में बैठी  |
बिस्तर की खुशबु खूबसूरत
मदहोश महकती रात का
अहसास दिलाती हुई  |
सारी कायनात थम सी गई |
सबकी  बेकरारी बढने लगी |
चांदनी का पहरा लगने लगा |
रात की स्याही ने चादर पर
अपना पैगाम लिख डाला |
फूल की खुशबु ने सारे
आलम को महका दिया |
सनम ने चुपके से ...
कानों में क्या कहा |
हर तरफ सन्नाटे की चादर
पसर गई |
बिस्तर की  सलवटों ने
चांद के आने का सबूत दे डाला |
हवा के मंद झोकें बदन को
छुकरके जब गुजरे |
सुबह की किरणों ने फिर से
दस्तक दे फिर  नई सुबह का
सुन्दर  पैगाम दे डाला |