जब - जब बहार है आती |
गम के सारे बादल है ले जाती |
जब चारों तरफ सन्नाटा है छाता |
हमसे वो कुछ तो है कह जाता |
सबके हिस्से का है सूरज |
सबके हिस्से में आते है सुख - दुःख |
फिर क्यु नदिया सी रोती है ये आँखे ...
क्यु नहीं कह देती हंसके सारी बातें |
बादल बनके बरसकर
फिर क्यु अपना आस्तिव है रचती |
क्यु छाता है ये अँधेरा
किससे मिलने जाता है छुप - छुपकर |
और उगते सूरज की रौशनी में
क्यु शर्माता है वो रह - रहकर |
नदिया की कलकल धारा सा
क्यु बहता है सबका मन |
राह में मिलते फूल - काँटों को
क्यु समेटता है हर पल |
धुल - मिटटी का श्रृंगार करके
क्यु मचलती है ये पवन हरदम |
कभी मंद गति से बढती
तो कभी क्यु ढहा देती है सबकुछ |
हाँ कोई तो है इसका रचेता
वही करवाता है हमसे ये सबकुछ |