बेबसी




लोग रूठ जाते हैं मुझसे ,
और मुझे मनाना नहीं आता |
मैं चाहती  हूँ क्या ,
मुझे बताना  नहीं आता |
आँसुओं को पीना पुरानी आदत है ,
मुझे  आंसू बहाना नहीं आता |
लोग कहते हैं मेरा दिल है पत्थर का 
इसलिए इसको पिघलाना नहीं आता |
अब क्या कहूँ मैं...
क्या आता है, क्या नहीं आता |
बस मुझे मौसम की तरह ,
बार - बार बदल जाना नहीं आता | 
अब क्या करे कीससे कहें हम ,
हमें तो किसी को मनाना भी नहीं आता |

6 टिप्‍पणियां:

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

बस मुझे मौसम की तरह ,
बार - बार बदल जाना नहीं आता !

ye to bhut badi khasiyat hai, agar sach hai to:)

god bless!

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

kbhi hamare blog pe dustak den:)

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

minakshiji,

seemit shabdon main bahut hi sundar baat ki aapne, bahut bahut aabhar

Arun M ने कहा…

मुझे भी नहीं पता मुझे
क्या आता है, क्या नहीं आता !
पर आपकी इस रचना ने जी को को ऐसा बांधा
शब्दों को ऐसा पिरोया
कि मन बस मोहित हो गया
कविता आपकी ये हमे कैसी लगी
अन्यथा मै भी ज़रा तबीयत से बता पाता

babanpandey ने कहा…

वाह क्या बात कही //
कविता का शीर्षक ही बात स्पस्ट कर देता है

राकेश कौशिक ने कहा…

"बस मुझे मौसम की तरह
बार-बार बदल जाना नहीं आता"

समसामयिक सटीक तथा सार्थक प्रस्तुति - बधाई तथा नव वर्ष की शुभकामनाएं