सुना था
उस गांव में अब
कोई नहीं रहता |
टिमटिमाती लौ में
एक साया अक्सर
दिखाई है देता |
किसका है वो अपना
जो गश्त वहाँ लगता है ?
अपने तो कहते हैं वहाँ
अब वहाँ सन्नाटों ने
घर बसाया है |
वो लाठी , वो चश्मा
वो झुकी झुकी सी देह
किस गुजरे पल की
दास्ताँ है कह रही ?
बंजर पड़ी धरती को
निहारकर कर वो क्यु
उसके लहलहाने का
इंतज़ार है कर रही |
शायद अपनों को
इस बात का अब
इल्म ही नहीं |
कि आज भी ...उनकी जननी
अपनों के लौट आने की
आस में है जी रही |
15 टिप्पणियाँ:
अपनों में लौट जाने की आस सदा ही जीवित रहती है..
शहर की चकाचौंध ने सचमुच भुला दिया है अपनों को..अपनों के सपनो को...
भावपूर्ण रचना..
एक जूठी उम्मीद ही जिन्दगी को जीना सिखा देती है....
कभी न ख़त्म होने वाला इंतजारउसके लिए जीने का सहारा है...
यही यथार्थ है...
waah..intzaar ka dard..
सुन्दर..पोस्ट . होली की शुभ कामनाएं /
मेरे भी ब्लॉग पर आये /
kaheen door jab din dhal jaaye....
बढ़िया प्रस्तुति
Gyan Darpan
..
कल 03/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
रूठे हैं पिया....अब तो मान ही जायेंगे.....प्रेम समर्पण से लबालब अद्भुत रचना
उम्मीद झूठी ही सही, लेकिन अपनों की आस लगी रहती है.
पहली बार आपके ब्लॉग पर जाना हुआ
मीनाक्षीजी, आपकी सीधी सच्ची कविता छू गयी, बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति!
बहुत प्यारी रचना...
झूटी उम्मीद भी जीने का सबब बन जाती है...
सादर.
भावपूर्ण अभिव्यक्ति
bahut sunder bhav ki rachna........
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