क्रांति ही जीवन

मनुष्य हर वक़त विवादों में घिरे रहना पसंद करता है क्युकी यही उसे आगे बड़ने की राह दिखाती है अगर वो एसा न करे तो आगे का सफ़र उसके लिए मुश्किल हो जाता है ! मानव का स्वभाव  ही कुच्छ एसा है की वो जितनी भी मेहनत करता है तो उसके पिच्छे उसका अपना ही स्वार्थ  है ! उसका अंदाज अलग हो सकता है पर  लक्ष्य सिर्फ एक की मुझे ख़ुशी केसे मिलेगी   क्या करने से मिलेगी ! हम सब  इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं, पर इस सत्य को अपनाने से इंकार करते हैं ! जीवन में हम जितनी मेहनत करते हैं हमे सिर्फ वही वापस मिलता है लेकिन फिर भी हम किसी दुसरे का सहारा खोजते रहते हैं की शायद वो हमसे बेहतर हमारे लिए कर सकेगा ! कहने का तात्पर्य यह है की जब सब कुच्छ हमारे करने पर ही निर्फर है तो फिर क्यु  न खुद आगे बड़  कर उसे अंजाम तक पहुचाया जाये !
                                                      अब राजनीति को ही ले लो जो कहती है की भविष्य में इक्सवी सदी लानी है वो खुद यहाँ नहीं है तो इकिस्वी सदी तो बहुत दूर की बात है जिनका आधार ही दुसरो की मेहनत पर टिका हो वो हमे आगे कहाँ तक ले जायेंगे ! हर नेता किसी न किसी ज्योतिष , महात्मा को अपना गुरु बनाये बैठा है जिसे अपने भविष्य की खबर नहीं............ वो हमारा भविष्य केसे  सवार सकती  है ! जिसका सारा वक़्त अपने आप को सुरक्षित रखने में ही बीत जाता हो वो हमारी सुरक्षा का इंतजाम केसे जुटा पायेगी ! उनका सारा समय अपने २ सवार्थ के लिए खिंचा तानी में ही बीत जाता है उनके लिए जनता के लिए समय निकल पाना केसे संभव हो सकता है हमे तो इनकी इस मेहनत पर तरस खाना चाहिए की इतनी मेहनत के बाद भी कुच्छ को ही सफलता मिल पाती है और हम हैं की ये सब  जानते हुए भी बार २ अपने भविष्य की डोर इनके हाथो में थाम देते हैं ! जब ये तय है की मनुष्य सिर्फ अपने लिए ही जीता है तो फिर बार २ ये गलती क्यु करे मेहनत खुद करते हैं और उसका इनाम दुसरे  को सोंप देते हैं ! हमे तो गर्व होना चाहिए की हमारी वजह से उनका जीवन इतना सुखमय व्यतीत  हो रहा है !राजनीति तो एसा खेल है की जो इन्सान को कभी मिलकर रहने ही  न दे वो सिर्फ और सिर्फ तोड़ सकती है उसका काम इन्सान को इन्सान से अलग करना है न की जोड़ना ! वो धर्मो को कभी एक जुट रहने ही नहीं दे सकती उनका काम है इंसानों को धर्मो  में बाँटना और उनके बिच में दूरियां  पैदा करना क्युकी अगर वो एसा नहीं करते हैं तो हमारा विश्वास केसे जीत पाएंगे ! और अगर हमसब एक हो गए तो  शिकायत कीससे होगी और फिर नेताओं  का क्या  काम तब तो हमारा अपना फेसला और अपना जीवन होगा ! राजनीति मनुष्य  को कभी विकसित होते देख ही नहीं सकती क्युकी जितना मनुष्य विकसित होगा , उतना ही उसे गुलाम बनाना मुश्किल हो जायेगा उतना ही उसे सवतंत्र होने से रोकना मुश्किल हो जायेगा ! जरुरत सिर्फ अपने आप को   समझने की है की में क्या हु और क्या चाहता हु जब में हु तभी तो धरम है ! हर धरम इन्सान को मिलकर रहने की बात कहता है  तो फिर आज देश में इतना शोर क्यु  मचा हुआ है लोग एक दुसरे को मार रहे हैं और दुहाई धरम  की दे रहे हैं  तो ये कोंन  सा धरम है जो एसा करने की इज़ाज़त दे रहा है और हर घर हर रोज मातम मना  रहा है और इसे खेलने वाला बेखबर बैठा है ,तो किस काम की वो राजनीति जिसके हाथ में इतने भरोसे से हम अपना जीवन सोंप देते हैं और समय आने पर वो हमारी रक्षा भी नहीं कर पाती ! इन सब बातों  से तो इसमें इन सबका अपना ही सवार्थ साफ़ नज़र आता है ! जब ये बात सही लगती है तो क्यु  न हम अपना जीवन अपने भरोसे जी कर देखे और  अपने जीवन को अपने आप खुबसूरत बनाये !
                                         स्वतंत्रता  एक क्रांति का नाम है वो हमे भविष्य में आगे ले जा सकती है क्रांति  तभी संभव  हो सकती है जब हम पुराने को छोड़ कर नए को अपनाने की हिम्मत  कर सके पर ये सब  करना हमारे लिए बहुत मुश्किल काम है पर असंभव भी नहीं ! इसका कारण  ये है की हम पुराने से अच्छी तरह से वाकिफ होते हैं हम उसके अच्छे बुरे से भली भांति परिचित होते हैं इसलिए बार २ उसी तरफ बढ जाते हैं बेशक उससे हमे कितनी भी तकलीफ क्यु  न हो रही हो पर हमें  उसकी आदत जो पड़ गई है ! नए को अपनाने में हमे घबराहट होती है क्युकी उसके बारे में हम कुच्छ नहीं जानते इसलिए हिम्मत नहीं जुटा पाते और वही घिसी - पीटी   जिंदगी जीते चले जाते हैं और उसी में संतोष करते रहते हैं ! जबकि संतोष में सुख नहीं बल्कि सुखी इन्सान में संतोष होता है ! इसलिए हमे अगर जीवन में क्रांति लानी है तो हमे अपनी  गलत आदतों  का त्याग करके नये को धारण करना ही होगा ! क्युकी जो हमारे समाज और हमे परेशां कर रही हो एसे को अपने साथ जोड़ कर रखने से क्या फायदा उसे तो त्याग कर अच्छे  को ही ग्रहण करने मै समझदारी है !

4 टिप्‍पणियां:

Krishna Baraskar ने कहा…
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Krishna Baraskar ने कहा…

""राजनीति मनष्य को कभी विकसित होते देख ही नहीं सकती क्युकी जितना मनुष्य विकसित होगा , उतना ही उसे गुलाम बनाना मुश्किल हो जायेगा उतना ही उसे सवतंत्र होने से रोकना मुश्किल हो जायेगा ! ""

wah bahut achhey,

""वो धर्मो को कभी एक जुट रहने ही नहीं दे सकती उनका काम है इंसानों को धर्मो में बाँटना और उनके बिच में दूरिय पैदा करना क्युकी अगर वो एसा नहीं करते हैं तो हमारा विश्वास केसे जीत पाएंगे !और अगर हमसब एक हो गए तो शिकायत कीससे होगी और फिर नेताओ का क्या काम तब तो हमारा अपना फेसला और अपना जीवन होगा !""

पर इस बारे में मै सोचता हूँ कि धर्मों को बाँटने का पूरा श्रेय सिर्फ़ राजनिति को नही दिया जाना चाहिए क्योंकि मै समझता हूँ कि धर्मों को बाँटने में सबसे ज्यादा अलग-अलग धर्मों के अपने-अपने अलग नियम, परम्परा और सर्ते है इसी कारण एक कुछ बातें जो एक धर्म के लिए पुज्यनिय है वही दुसरे धर्म के लिए भोग कि वस्तु है! दुसड़ा दुनिया पर अपाने धर्म कि सत्त्ता को फैलाने कि लालसा जो कुछ धर्मों के कट्टर संघटनो में एक मिसन के रुप में दिमाँग में भाड़ा पढ़ा है! बस धर्मनिरपेक्ष भारत को हथियाने कि कट्टरपंथियों कि इसी साजिस को मै लोगो को बाँटने का जिम्मेदार मानता हूँ... राजनीतिज्ञ तो बस एक भोगी है उन्हें तो सिर्फ़ उपभोग करना आता है ... चाहे धर्मों का उपभोग हो या कट्टरपंथियों कि भावनावो को भड़काकर उनका रांजिनितिक उपयोग करने का !

Krishna Baraskar ने कहा…

वैसे आपने 3 विसयों को एक साथ प्रस्तुत किया है! अच्छी कोशिस है

minakshi pant ने कहा…

मै तुम्हारी बहुत आभारी हु क्युकी तुमने ही मुझे सही राह दिखाई जिससे मै अपनी भावनाओ को ओरों तक आसानी से पंहुचा प् रही हु बस तुम इसी तरह सभी का मार्गदर्शन करते रहना मै तुम्हारी हमेशा शुक्रगुजार रहूंगी धन्यवाद !