कुच्छ फुर्सत के पल लहरों के संग

                     
आज हम सागर किनारे आये हैं 
            कुच्छ उसकी और कुच्छ अपनी सुनाने लाये हैं !
किसको फुर्सत है इस भरी  दुनिया मै , 
                    इसलिए सिर्फ तन्हाई ही साथ लाये हैं !
जानते हैं हम की वो भी अकेला है !
                  क्युकी दुनिया तो भीड़ भरा मेला है !
सब तेरे पहलु मै आके चले जाते हैं !
                 अपना हर दर्द तुझको सुना जाते हैं !
शायद तेरी ख़ामोशी का फायदा उठाते हैं !
                तेरे भीतर  के दर्द को न जान पाते हैं !
तेरी हिम्मत की हम दाद देते हैं !
                  फिर भी तुझसे ये राज़ आज पूछते है !
क्या  एसी बात है की इतना खामोश है तू !
                  हम तो थोड़े से गम मै ही टूट जाते हैं !
तेरी लहरों से तो हमे डर लगता है !
                  फिर भी तुझमे समां जाने का दिल करता है !
ना जाने किस किनारे मै ले जाएँगी ये लहरें !
                  बस तुझसे बिझ्ड़ने का ही डर रहता है !

6 टिप्‍पणियां:

खबरों की दुनियाँ ने कहा…

बहुत सुन्दर लाईनें । बधाई ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 29 -09 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में ...उगते सूरज ..उगते ख़्वाबों से दोस्ती

Rakesh Kumar ने कहा…

ओह! मीनाक्षी जी,
आपके 'कुच्छ' में
तो बहुत कुछ है जी.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

नवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ.

सदा ने कहा…

बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

mridula pradhan ने कहा…

bahut achchi lagi......

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत ही बढ़िया।

सादर