ख्वाबों की ताबीर

सुना है उसके शहर की ...
बात बड़ी निराली है ,
सुना है ढलते सूरज ने ...
कई दास्ताँ कह डाली है ,
सुना है जुगनुओं ने ...
कई बारात निकाली है ,
सुना है हर रात वहां ...
ईद और दिवाली है ,
सुना है अल्फ़ाज़ लबों से ...
फूलों की तरह झरते हैं ,
सुना है उसके शहर में
पत्ते भी गले मिलते हैं ,
अब उसके शहर में जाएँ
तो क्या पूछकर जाएँ ?
कहाँ , कैसे गुजारेंगें रात ...
ये बात किस - किसको बताये ,
चलो सितारों आज ही सफर पे निकलते हैं ,
जहन में कैद ख़्वाब की ताबीर करके देखते हैं ।
सुना है लोग उसे जी भरके देखते है ,
हम भी उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं ।

9 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बैसाखी और अम्बेदकर जयन्ती की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार (14-04-2015) को "सब से सुंदर क्या है जग में" {चर्चा - 1947} पर भी होगी!
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Minakshi Pant ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया रूपचन्द्र शास्त्री जी ।

ऋषभ शुक्ला ने कहा…

आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा, और यहाँ आकर मुझे एक अच्छे ब्लॉग को फॉलो करने का अवसर मिला. मैं भी ब्लॉग लिखता हूँ, और हमेशा अच्छा लिखने की कोशिस करता हूँ. कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आये और मेरा मार्गदर्शन करें.

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Minakshi Pant ने कहा…

शुक्रिया ऋषभ शुक्ला जी ।

Jitendra tayal ने कहा…

सुन्दर रचना

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर ।

Rakesh Kaushik ने कहा…

प्रशंसनीय

GathaEditor Onlinegatha ने कहा…

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ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "भूली-बिसरी सी गलियाँ - 9 “ , मे आप के ब्लॉग को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !