कमसीन कली


वो जो फूल बन  खड़ी थी ,
                 मेरे जाते ही महक बन उड़ गई !
वो जो बर्फ बन खड़ी थी ,
                मेरे जाते ही पानी बन पिघल गई !
वो जो नदी बन चड़ी थी ,
                मेरे जाते ही रेत बन बिखर गई !
वो जो जुगनू बन चमकी थी ,
                 मेरे जाते  ही रात बन खो गई !
नए नए  रूप मै पास बुलाती थी ,
              न जाने वो  गुम क्यु  हो जाती थी !
कभी जुगनू ,कभी तितली बनकर ,
                 मेरे ख्वाबों मै वो रोज़ आती थी !
नए- नए रंग फिर वो भरती थी ,
                 मेरे सपनों को रोज़ सजाती थी !
केसी थी वो कमसीन कली ,
                   जो रोज़ मुझे सताती थी ! 
जब मै ....करीब जाता था ,            
             तो मुझसे अपना दामन बचाती थी !
मै दिन भर सपने सजाता था ,
                    वो रात होते ही पलट जाती थी !

5 टिप्‍पणियां:

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

केवल राम ने कहा…

मीनाक्षी पन्त जी आपका कैसे धन्यवाद करूँ ..बस यूँ ही उत्साहित करते रहना...."धर्म और दर्शन" ब्लॉग पर मेरा समर्थन करने के लिए आपका आभारी हूँ ....आपका बहुत - बहुत धन्यवाद

केवल राम ने कहा…

बहुत सुंदर और प्रभावी प्रस्तुति ...आपका आभार

केवल राम ने कहा…

केसी थी वो कमसीन कली ,
जो रोज़ मुझे सताती थी !
जब मै ....करीब जाता था ,
तो मुझसे अपना दामन बचाती थी !
मै दिन भर सपने सजाता था ,
वो रात होते ही पलट जाती थी !
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अक्सर ऐसा होता है इश्क में ..............दिल की बात कह दी आपने ...बहुत बहुत आभार

Neeraj http://knkayastha.blogspot.com ने कहा…

सुन्दर कविता...