
वो जो फूल बन खड़ी थी ,
मेरे जाते ही महक बन उड़ गई !
वो जो बर्फ बन खड़ी थी ,
मेरे जाते ही पानी बन पिघल गई !
वो जो नदी बन चड़ी थी ,
मेरे जाते ही रेत बन बिखर गई !
वो जो जुगनू बन चमकी थी ,
मेरे जाते ही रात बन खो गई !
नए नए रूप मै पास बुलाती थी ,
न जाने वो गुम क्यु हो जाती थी !
कभी जुगनू ,कभी तितली बनकर ,
मेरे ख्वाबों मै वो रोज़ आती थी !
नए- नए रंग फिर वो भरती थी ,
मेरे सपनों को रोज़ सजाती थी !
केसी थी वो कमसीन कली ,
जो रोज़ मुझे सताती थी !
जब मै ....करीब जाता था ,
तो मुझसे अपना दामन बचाती थी !
मै दिन भर सपने सजाता था ,
वो रात होते ही पलट जाती थी !
4 टिप्पणियां:
मीनाक्षी पन्त जी आपका कैसे धन्यवाद करूँ ..बस यूँ ही उत्साहित करते रहना...."धर्म और दर्शन" ब्लॉग पर मेरा समर्थन करने के लिए आपका आभारी हूँ ....आपका बहुत - बहुत धन्यवाद
बहुत सुंदर और प्रभावी प्रस्तुति ...आपका आभार
केसी थी वो कमसीन कली ,
जो रोज़ मुझे सताती थी !
जब मै ....करीब जाता था ,
तो मुझसे अपना दामन बचाती थी !
मै दिन भर सपने सजाता था ,
वो रात होते ही पलट जाती थी !
xxxxxxxxxxxxxxxxxx
अक्सर ऐसा होता है इश्क में ..............दिल की बात कह दी आपने ...बहुत बहुत आभार
सुन्दर कविता...
एक टिप्पणी भेजें