संघर्ष अब भी जारी


sad girl


 

बिटिया ने कदम रख देहलीज़ में
सपनो को सजाने का मन बनाया 

न जाने कब ये खबर आग की तरह 
हर तरफ फ़ैल गई ?

गलियों में आना - जाना लगा है 
घर में कुशल लेने वालों का ताँता लगा है ,
अभी पंख फडफडाये भी न थे की ...
चील , गिद्दों की नजर में लोभ छाने लगा है ,

आँचल में छुपाती देह अपनी
वो कसमसाई सी खड़ी है
आज तक जो बेबाक खेलती थी
तंग गलियों में ...
आज उन्ही से बचके गुजर रही है

पेट की भूख उसे बाहर धकेलती
घूरती निगाह उसके होंसले छीन लेती
न भूख का निवारण हुआ
और न ही मंजिल मिली
जख्मी हाथ , लहुलुहान जिस्म
होंठों पर निशानों में ही
सिमट गई जिंदगी |

10 टिप्‍पणियां:

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

झंझोरती हुई रचना

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

कड़ुआ सच ।

Digvijay Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना बुधवार 30 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (29-04-2014) को "संघर्ष अब भी जारी" (चर्चा मंच-1597) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kaushal Lal ने कहा…

झंझोरती हुई कड़ुआ सच.....

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

बहुत सुंदर ..........

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

Bahut sundar rachan nari peeda ka sajeev chitran . Bahut bahut aabhar aapka naveentripathi35@gmail.com fb pr aamantran sweekaren

आशा जोगळेकर ने कहा…

आज का कडवा यथार्थ आजका ही क्यूं शायद हमेशा का।

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सटीक और मर्मस्पर्शी रचना...

Minakshi Pant ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया दोस्तों ।