अब न रहे खेत - खलियान



बरस बादल , घटा बनकर 
धरा की रूह है प्यासी |
भिगो तन को सभी के 
हर तरफ छाई है ख़ामोशी   |
भरोसा न रख तुझपर इंसा ने ,
उसे फिर कर दिया रुसवा |
तेरा नाम बदनाम कर
बना डाले उसने कई और मकां
 |
खुदगर्ज़ कितना हो गया इंसा
जिसे न फ़िक्र किसी की |
परवाह जो करने लगा
अब वो सिर्फ और सिर्फ खुद ही की |
लहू अपना पीला जो
पाल रही है वर्षों से जन - जन को |
इंसान बेदर्दी  से  खुले आम ...
भेद रहा है आज उसके ही सीने को |
चंद पैसों की खातिर बेच रहा 

आज वो खुद अपने ही अंश को |

14 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

अच्छी रचना

anju(anu) choudhary ने कहा…

सच का आईना दिखाती रचना....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

काश, किसी देश के लिये ऐसी कविता लिखने की स्थिति न आये।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

भावुक कर देने वाली कविता... सचमुच स्थिति विषम हो रही है...

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति

मनीष कुमार ‘नीलू’ ने कहा…

भावपूर्ण रचना ...
बहुत बहुत बधाई आपको !
मेरी नई पोस्ट के लीये आपका स्वागत है !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मानव भूके भेदिये सा सब कुछ खा जाना चाहता है ... सचाई बयान करती है ये रचना ...

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सार्थक प्रस्तुति।

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

aaj ka 100% sach

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह ने कहा…

accha soch,sunder rachna

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

bahut sunder sateek rachna par apko badhayi.

Mamta Bajpai ने कहा…

संवेदन शील रचना ..बहत बदिया

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

सैटिंग में जाकर
इसके कैलेंडर को
कर लीजिए सही
बहुत पुरानी
दिखला रही है तिथि।

खेत भी हैं
खलिहान भी हैं
बियाबान भी हैं
और उनके
ऊपर उड़ते
वायुयान भी हैं।

M VERMA ने कहा…

सच तो ये है कि सच आज लहुलुहान है