सबक



हर तरफ शोर सुन धरा ने निर्णय था लिया ,
बादलों को बगावत का प्रस्ताव लिख दिया |

उमड़ - घुमड़ के शोर ने हर शोर को दबा दिया ,
मूक तांडव ने इंसानी ज़ज्बातों को जगा दिया |

ऐसे भिगोया धरा को की लहुलुहान कर दिया ,
हर तरफ दर्द का भयंकर सैलाब ही ला दिया |

चीख - पुकार ने मानव मन को दहला दिया ,
तब - तक बादलों ने अपना काम कर दिया |

सबक सीखाने को धरा ने था ये काम किया ,
बादलों ने प्रकृति का रोष ही बयाँ कर दिया |

7 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना बधाई आपको

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (06-07-2013) को <a href="http://charchamanch.blogspot.in/ चर्चा मंच <a href=" पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

न जाने किसने किसको दण्ड दिया है।

Anita (अनिता) ने कहा…

धरा व्याकुल...पीड़ा उमड़ी..
आन पड़ी विपदा की घड़ी... :(

~सादर!

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुती,अभार।

Ramakant Singh ने कहा…

ऐसे भिगोया धरा को की लहुलुहान कर दिया ,
हर तरफ दर्द का भयंकर सैलाब ही ला दिया |
प्रकृति की व्याकुलता का सुन्दर चित्रण