वो सुबह जरुर आएगी ...



सुबह भी चली गई ,
शाम भी ढल गया ,
रात अपने आगोश में 
चाँद को लेकर निकल गया |

कल फिर आएगा ,
सूरज को साथ लायेगा ,
नये दिन के साथ हम भी 
नये सपनों में खो जायेंगें |

मन को नया बनायेंगें ,
बीते कल को भुलाएँगें ,
नये पल के स्वागत में 

हम फिर महफ़िल सजायेंगें |

तुम भी जरुर आना ,
वादों को संग में लाना ,
गुजरे कल को भुला 

वर्तमान में जीना सीख जायेगें |

8 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (20-10-2013)
शेष : चर्चा मंचःअंक-1404 में "मयंक का कोना"
पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बेहतरीन सुंदर रचना !

RECENT POST : - एक जबाब माँगा था.

आशा जोगळेकर ने कहा…

गुजरे कल को भुला कर वर्तमान में जीना सीख जायेंगे।
सुंदर सही खयाल। सुंदर प्रस्तुति भी।

Ramakant Singh ने कहा…

बेहतरीन सुंदर रचना !

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

प्रभावशाली रचना |

आइये, कीजिये:- "झारखण्ड की सैर"

aprna tripathi ने कहा…

नये कल की आशा की उमीम्द को रौशन करती अच्छी रचना.....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जो बीत गया, वह जाने दें।

Minakshi Pant ने कहा…

बहुत २ शुक्रिया दोस्तों :)