सुनो न प्रिय ..

सुनो न प्रिय ..

चूड़ी की खन - खन 
पायल की छम - छम
हमें भाती नही है ।
ये शब्दों की लुका - छिपी 
हमें आती नही है ।
पल - पल में बदल जाना 
जान लेती है कई मर्तबा ।
ये रिश्तों में रंजिशें 
हमें सताती बहुत है |

सुनो न प्रिय ..


कागज़ ,कलम , 
स्याही का गहना हमें दिला दो ।
इतिहास के पन्नों में ...
कुछ गड़ने की सलाह दो ।
देश के हित में ...
कुछ कर गुजरने का अरमान है |
जन - जन की खातिर 
जागा 
दिल में एक सपना है  |

सुनो न प्रिय 

ये घूँघट में लिपटी देह में
घबराता है मन मेरा ,
पल - पल के तिरस्कार से ...
काँप जाता है देह सारा ।
ज्यादा नही , बस थोड़े से ही
की तो , तमन्ना है  ।
नीले गगन को जी भरके निहारने का 

सपना है ।
न बंधन हो कोई और न हो कोई इल्तजा ।
सफर चलता रहे युही ...
हम दोनों के दरमियाँ ।

4 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

भली लगी यह मनुहार प्रिय से !

संजय भास्‍कर ने कहा…

कुछ तो बात है ....:))

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वाह, बहुत ही सुन्दर और प्रवाहमय रचना।

Jitendra tayal ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, स्त्री मन की वाह