आस्था

क्या है ये आस्था जिसका गुणगान हम हर वक़्त करते रहते हैं ,पर उसका सही ज्ञान हमे आज तक मालूम ही  नहीं है ! हम सब एक अंधी दोड़  का हिस्सा  भर  है हमने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की  की इसका सही मायने मै अर्थ क्या  है और इससे आखिर हम चाहते क्या हैं ? हम तो बस एक के पीछे एक लम्बी लाइन लगाते  चले जाते हैं जो सिर्फ और सिर्फ एक भारी भीड़ और धक्का - मुक्की से ज्यादा कुच्छ भी नहीं है ! जिसको खोजते -२ हम इतनी दूर निकल जाते हैं वो तो  हर वक़्त हमारे साथ ही रहता है ,पर हमारी संकुचित सोच , पुराने संस्कार , दिखावा    ये सब हमारी आँखों मै पट्टी  बाँधे रखती है और हम एक बेजान लाश की तरह सारे मंदिर, मस्जिद , और गुरुदवारो मै उसे खोजते  फिरते हैं ! जबकि हम जिसकी तलाश मै चलते हैं वो तो हमेशा  हमारे साथ जाता भी है और वापिस  भी वही आता है !
         भगवान वह आकृति है जिसकी हम इतनी श्रद्धा से पूजा अर्चना  करते हैं उस पर विश्वास करते हैं ,अगर उसी के प्रति हमारी आस्था है तो वो हमसे कुच्छ भी नहीं मांगता ! वो तो हर मोड़ पर हमारा साथ देने के लिए हर वक़्त तैयार रहता है ! उसका तो उद्देश्य ही हम सब से अच्छे काम करवाते रहने की होती है और हम उसके इतने करीब जा कर भी ये बात समझ ही नहीं पाते और सारी जिंदगी इसी अपाथापी मै बिता देते हैं और जिंदगी भर एसा कुच्छ भी नहीं कर पाते जिसके लिए उसने हमे ज़मीं मै भेजा था ! मेरी सोच के अनुसार किसी पर आस्था करना गलत नहीं है उसके बिना तो संसार मै कुच्छ भी नहीं है पर एसा  करने के साथ किसी येसे काम को करना जिससे हमारी उस आस्था का मकसद भी हल हो जाये और  ज्यादा  अच्छा है ! हम किसी येसे इन्सान की मदद करे जिसको हमारी जरुरत है और हम उसे मदद देने मै सक्षम भी हैं तो हमारी उसके प्रति की गई आस्था का असर दोगुना हो जाता है क्युकी उसके अन्दर भी वही विराजमान है जिसकी खोज हम बाहर करते हैं और उसके अन्दर से निकली ख़ुशी ही भगवान का  आशीर्वाद है ! हम कभी अपने आपको भीतर तक देखते ही नहीं है की हम क्या चाह रहे हैं और क्या करने से क्या असर होगा हम तो सिर्फ  आँख मूंद कर उस दिशा मै चल पड़ते हैं जहां दूसरा हमे ले जाता है हमे खुद पर ही भरोसा नहीं तो हम किसी और पर भरोसा केसे कर सकते हैं ? सबसे पहले हमे अपना भरोसा जीतना  है की क्या गलत और क्या सही हो सकता है ! जब हम अपनी सोच समझ से काम करते हैं तो एसा कभी नहीं हो सकता की हम गलत हो जाये ! अगर हमे उसे पाना है तो हमारी पहली दस्तक उस गरीब के घर मै होनी चाहिए जिसके अन्दर की दुआ उस तक पहुचने की सीडी होती है ! कितना आसां है ये समझना की उसके बनाये हुए संसार मै इतनी गरीबी है तो वह चेन  से मंदिर, मस्जिद या गुरुदवारो मै केसे विराजमान हो सकते हैं ? हमारे देश मै ५० करोड़ की आबादी गरीब जनता की है और हम ये सोच ले की भगवान उन सब की दुआ ना सुन कर हमारी सुने कहाँ तक सही होगा ? बल्कि हमे तो उसका शुक्रगुजार होना चाहिए की उसने हमे इतना कुच्छ दे दिया की हम अगर चाहे तो दुसरो की मदद करके उसका काम आसां कर सकते हैं !
                                                भगवान के प्रति आस्था रखना और झूठी शान , दिखावा दो अलग २ बात है ! हम धार्मिक स्थानों मै जाकर झूठी शान की खातिर इतना २ पैसा लुटा आते हैं जिसकी वहां जरूरत ही नहीं होती जो हमेशा हमे देता रहता है उसे इन सब  की कहाँ जरुरत हो सकती है वो हमे उन जरुरत मंद लोगो को देने का माध्यम  बनाना चाहता है पर हम है की इस तरह की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते और उसका दिया पैसा उसी के चरणों मै लोटा आते हैं जिसका इस्तेमाल गलत कामो मै हो जाता है और वो गरीब तक पहुँच ही नहीं पाता ! अब तिरुपति नाथ के मंदिर को ही ले तो वहां करोडो की सम्पति चढाई जाती है पर हमारे देश की जनता फिर भी भूख से बिलख रही है तो किस काम की वो झूटी आस्था जो अपने साथ रह रहे उस इन्सान का पेट न भर पा रही हो ? मेरे शब्दों मै एसी आस्था कभी सार्थक नहीं हो सकती ! जब एक इंसा का दुसरे इंसा के प्रति प्यार , दया भाव ही नहीं है तो वो भगवान से प्यार करने का दावा  केसे कर सकता है वो हमसे तब तक दूर हैं जब तक हम किसी इन्सान के चेहरे पर ख़ुशी न ला दे उसके बाद हमारी आस्था उसके प्रति अपने आप कमाल दिखाने  लगेगी ! अगर हमे उस तक पहुंचना है तो हमारी पहली सीडी इंसा का इंसा के प्रति प्यार ही है उसके बाद ही आगे का सफ़र शुरू किया जा सकता है जब तक पक्की नीव का निर्माण नहीं करेंगे तब तक पक्का घर केसे बना  सकते  है उसके बाद ही हमारा जिंदगी  का सफ़र आसां हो जायेगा और हम सुकून से रह पाएंगे और भगवान   के प्रति समर्पण का भी यही उदेश्ये है !
  भगवान कितने सरल अंदाज़ मै हमे अपने साथ जुड़ने का रास्ता बतला जाते हैं पर हम हर बार उसकी इस अदा को नज़र अंदाज़ कर देते हैं और दुबारा से उसी राह मै चल निकलते हैं जिसका कोई मतलब ही नहीं है! जानते हम सब  कुच्छ हैं पर उसके अंजाम से डरते हैं क्युकी उसे अपनाना हमारे लिए थोडा नया जरुर हो सकता है लेकिन  उससे नुकसान कुच्छ भी नहीं होगा बल्कि हमे अपने जीने का मकसद जरुर मिल जायेगा ! एक छोटी  सी  हिम्मत से लिया गया फ़ेसला हमारे देश की गरीबी को जड़ से ख़तम कर सकती है और हमे अपने आप को समझने और जानने का मोक्का दे सकती है की हम क्या हैं और असल मै चाहते क्या हैं ? चारो तरफ एक सुकून लाना ही तो हमारा मकसद होगा ?और अपने उस भगवान को जिसे हम गरीब नवाज़ , दिन दयाल और पालन हारे भी कहते रहते हैं उस नाम का मतलब भी सार्थक कर देंगे ! अगर हम गोर से सोचे तो इन्ही नामो मै कितना बड़ा राज़ छुपा है जो किसी न किसी तरह हमे कुच्छ बताना चाहता है ! शायद हमारी सही आस्था का परिचय भी  यही है !

5 टिप्‍पणियां:

मेरे भाव ने कहा…

हम किसी येसे इन्सान की मदद करे जिसको हमारी जरुरत है और हम उसे मदद देने मै सक्षम भी हैं....yahi aastha aur ishwar ke prati hamari sachchi bhakti hai.

खबरों की दुनियाँ , भाग्योत्कर्ष ने कहा…

अच्छी - सार्थक अभिव्यक्ति । शुभकामनाएं ।

सत्यप्रकाश पाण्डेय ने कहा…

सार्थक अभिव्यक्ति.

minakshi pant ने कहा…

आप सबका बहुत -बहुत धन्यवाद दोस्तों जो आपने मुझे अपना कीमती समय दिया !

svatantravichar ने कहा…

""जिसको खोजते -२ हम इतनी दूर निकल जाते हैं वो तो हर वक़्त हमारे साथ ही रहता है ,पर हमारी संकुचित सोच , पुराने संस्कार , दिखावा ये सब हमारी आँखों मै पट्टी बाँधे रखती है और हम एक बेजान लाश की तरह सारे मंदिर, मस्जिद , और गुरुदवारो मै उसे खोजते फिरते हैं !""
मै इन लाइनों पर अपना पक्ष रखना चाहता हूँ..
आपने पुराने संस्कारो को दोसी करार दिया है, आपको पुराने संस्कारों के बारे में अपनी राय स्पस्ठ करनी चाहिए..
आपने सायद कही ना कही कुछ इतिहास कि निस्पछ पुस्तक में पढ़ा होगा कि पूर्व में छोटे-छोटे राज्यों में बँटा था.. जिसे इस्लामी आक्रमणकारियों ने बहुत जीतने कि कोशिशें कि पर जब वे इस क्रय में असफल होने लगे तो उन्होंने इस पर विचार मंथन किया और पाया कि इस देश पर यदि विजय हासिल कर चीरकाल तक शासन करना है तो इसकि संस्कृति, इसकी संपत्ति- संत समाज, और इसकी शिक्षा पद्धति को खत्म करना होगा.. उसके बाद देश के इतिहास से लेकर मान्यतावो] संस्कृति, संत समाज, और इसकी शिक्षा पद्धति पर प्रहार कर इसे बदलने कि कोशिश कि गयी.. हिंदू राज्यों में फूट डाली गयी.. और जब यह फार्मूला कामयाब हुआ तो इसिके आधार पर भारतवंस के संपूर्ण साम्राज्य को बाँट बाँटकर आधिपत्य किया गया .. इसिका अनुसरण अँगरेजों ने भी किया और आज हमारी ये दुर्दशा है..
वरना आप हमारी शिक्षा पद्धति के बारे में जानना चाहती है तो चारों वेद, हिंदू शिक्षा पद्धति आधारित पुस्तकें पढकर देखिये जिनमें दुनिया कि स्वयं सिद्ध धरना दी हुई है और जिसे विज्ञान भी नही झूठलल्ला सका ..