संघर्ष ही जीवन


                                   जिंदगी अपने आप मै एक अजीब कहानी है ! इसके अपने कई - कई पहलूँ हैं जिसमे से होकर हमें  अक्सर गुजरना पड़ता है ! कभी इसके अनुभव बहुत कडवे होते हैं जो हमेंदर्द का एहसास देते हैं  तो कभी इतने   मीठे और  सुखद  की वो  जिन्दगी से  दूर हमे जाने ही नहीं देते ! पर वास्तविकता  यही है की सुख और दुःख दोनों हमारे जीवन  की सच्चाई है और दोनों ही पहलूँ हमें कोई न कोई सीख ही दे कर जाती है ! दोनों ही हमें जीवन मै आगे  बड़ते रहने की प्रेरणा देते रहते हैं क्युकी ये तो तय है की वक्त कभी  किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता वो तो अपनी गति से चलता ही रहता है हमें ही उसके साथ चलते रहने की लिए  कदम से कदम मिलाकर  उसकी रफ़्तार को पकडे रहना पड़ता है ! वेसे तो ये एक साधारण  सी 19 वर्ष की लड़की की एक एसी कहानी है जिसका  विश्वाश और द्रिड निश्चय  हमारे जीवन मै जीने के होंसले को बुलंद  करती है की अगर मन मै जीने की चाह और दिल मै उमंग हो तो हम अपनी मेहनत और लग्न से हर बुलदियों को छु  सकते हैं ! क्युकी हमारे होंसलें हमें वहां तक ले जाने मै पूरा - पूरा साथ देते  है !
                                                 माली (MALI) एक 19 वर्षीय बेले नर्तकी  थी जो एक कार दुर्घटना मै अपना बयाँ  हाथ गवां देती है उसका दोस्त उसे इस हालत मै देखते ही छोड़कर चला जाता है अब उसकी जिंदगी उसे वीरान लगने लगती है वो अपने आप को सँभालने की बहुत कोशिश करती है पर एक दिन हार कर अपने आप को खत्म करना चाहती है पर परिवार वाले उसे समझाते  हैं और उसे आगे बड़ने को प्रोत्साहित करतें हैं तो माली एक बार फिर से वही हिम्मत और होंसले को अपने अन्दर विकसित करती है और नए सिरे से अपनी जिन्दगी की शुरुवात  करती है की वो अब केसे लिखेगी , केसे बाल बनाएगी ,  केसे कपड़े धोएगी  ओर किस तरह से अपना खाना बनाएगी और इन सब के साथ वो अपने जीवन को फिर से एक दिशा दे पायेगी !
                               5  साल के बाद उसके अन्दर फिर से वही जोश और उमंग सर उठाने लगता है और वो एक बार फिर से उसी जोश के साथ  अपने नृत्य को जारी रखने के लिए थियटर जाती है पर तब तक वहां बहुत कुछ  बदल चुका था पर फिर भी उसके होंसले बुलंद  थे और वो  हार नहीं मान सकती थी  ! वहां उसे अपना एक हमदर्द दोस्त मिलता है  जो  उसकी मदद करने को राज़ी हो जाता है  पर उन    दिनों  2004  मे चीन में सार्स फेलने की वजह से सभी सिनेमाघर बंद हो गये थे  और वो अपने  नृत्य        का प्रदर्शन न कर पाई  पर फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी उसने अपने साथी कलाकार के साथ वो नृत्य बर्फ मै किया और उसे पसंद किया गया और उसका अपने ऊपर और बढ गया !                          
                           सितम्बर 2005 मै उसकी  मुलाकात राष्ट्रिय साइकलिंग ओलंपिक चेम्पियन जही क्सिओवेई ( zhai xiaowei ) से हुई ! जब जही 4 साल का था ट्रेक्टर से गिर गया था उस  उस दोरान उसनेअपना बायाँ पैर खो दिया था ! उस समय जब जही के पिता ने अपने 4 साल के बेटे से पूछा "   डाक्टर तुम्हारा पैर काटना चाहतें हैं क्या तुम तैयार हो ! " जही उस वक़्त इस बात को नहीं समझ सकता था वो बोला नहीं ! पिता ने फिर कहा " तुम्हें जिंदगी मै बहुत सी चुनोतियों  और कठिनाइयों को झेलना पड़ सकता है ! तुम घबराओगे तो नहीं ? जही ने पूछा ... क्या होती हैं ये कठिनाइयाँ और चुनोतियाँ ? क्या इनका स्वाद  अच्छा होता है ? उसके पिता  हँसे और उनकी आँखों से आंसूं आ गये और उन्होंने कहा " हाँ वो तुम्हारी मिट्ठी केन्डी की तरह होती है , तुम्हें सिर्फ उन्हें एक वक्त में एक  खाने की आवश्कता होती है ! " ( और इतना कहते ही पिता आंसुओं के साथ बाहर की और चले गये ! ) जही हमेशा एक आशावादी और महान विचारक की तरह खेलते रहें ! जब माली ( MALI ) ने पहली बार उससे नृत्य करने को कहा तो वो समझ नहीं पा रहें थे  की ये केसे संभव हो सकता है पर उसने विश्वास के साथ हांमी  भर दी की वो कोशिश जरुर करेगा ! जही और माली ने दिन रात मेहनत की ! इस दोरान वो बहुत बार गिरा पर फिरभी वो  उससे दुगनी ताकत से फिर से जुटा  रहा  और उनकी मेहनत एक दिन रंग ले आई !
                                माली और जही एक एसी पहली विकलांग जोड़ी थी जिसने पहली बार  सी . सी . टी . वि राष्ट्रिय नृत्य प्रतियोगिता मै भाग लिया था और लाखों  दिलों को जितने मै सफल हुई थी तो ये कहानी हमें  एक जोश और साहस से जीने की राह दिखाती  है की मंजिल कितनी भी दूर सही होंसला बनाये रखने वालों को मंजिल मिल ही जाती है ! 

5 टिप्‍पणियां:

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

'मंजिल है दूर जिंदगी छोटी तो क्या हुआ

हो हौसला तो पाँव बढ़ाने की देर है '

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

sach kaha aapne

" jeevan ek sanghars hai "

K.R.Baraskar ने कहा…

wah kya baat hai badhaayee ....

ZEAL ने कहा…

सार्थक सन्देश देता उम्दा लेख !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

इस साहस को प्रणाम है।