हवाओं का रुख

मैं न आ आई  थी तेरे दर 
न जाने राह कैसे मुड गई |
चल तो रही थी , चाल थी धीमीं ,
न जानें गति कैसे बढ गई |
राह अनजानी सी  थी ...
पर पाने की चाह ... न जाने 
क्या कमाल कर गई |
चाँद सूरज के साथ चलकर  ...
हम  सफर करते  गए |
अब भी न जान पाए  
की हमको तुम कैसे मिल गये |
तन की किसने सोची ...
यहाँ तो मन ही थे मिल गए |
भान ही  न पाए हम ,
कौन सी दुआ कब असर कर गई 
न आये  थे   कुछ मांगने   
न जाने ये दिल  कैसे जुड़ गये  |
कुछ क्षण को सारा आलम 
एकदम से ठहर गया |
दो पल का आराम ...
हमारी आँखों में  सपना नया भर गया |
देख मेरे पंख ...हवाओं ने भी  ...
अपना रुख यु बदल  दिया  |
ड़ाल तो छुम गई ...
पर ड़ाल का पंछी हवा में उड़ गया |
मैं न आई थी , तेरे दर 
रास्ता ही खुद मुड गया |



24 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

देख मेरे पंख ...हवाओं ने भी ...
अपना रुख यु बदल दिया |
ड़ाल तो छुम गई ...
पर ड़ाल का पंछी हवा में उड़ गया |

बहुत खूब ... रस्ते अचानक ही बदल जाते हैं और फिर हमें उनके अनुसार ही चलना पड़ता है ..

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

सुन्दर रचना .......
जुनून उससे मिलने का .......कहाँ कुछ आभास होने देता है |

निर्मला कपिला ने कहा…

अगर आदमी मे हौसला और जज़्बा हो तो हवायें अक्सर रुख मोड लेती हैं। अच्छे भाव। शुभकामनायें।

मदन शर्मा ने कहा…

बहुत खूब -- भावमय रचना के लिये बहुत बहुत बधाई

मदन शर्मा ने कहा…

बहुत खूब -- भावमय रचना के लिये बहुत बहुत बधाई

मदन शर्मा ने कहा…

बहुत खूब -- भावमय रचना के लिये बहुत बहुत बधाई

मदन शर्मा ने कहा…

बहुत खूब -- भावमय रचना के लिये बहुत बहुत बधाई

anu ने कहा…

बहुत भावभीनी खुशबु ...इस कविता की

मुमकिन है के ख्वाबों को मंजिल मिल जाये तलाशते ख़ुद में
anu

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

उसकी नजरें और हवा रुख बदल लेती हैं।

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (20-6-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

sushma 'आहुति' ने कहा…

bhut khubsrat rachna....

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर भावभीनी रचना|

Dr Varsha Singh ने कहा…

कौन सी दुआ कब असर कर गई
न आये थे कुछ मांगने
न जाने ये दिल कैसे जुड़ गये |


बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना ! हार्दिक शुभकामनायें !

वाणी गीत ने कहा…

मैं तो नहीं आयी तेरे द्वार जाने कैसे रास्ते मुड गए ...
यही तो नियति है ..
कोमल एहसास !

रचना दीक्षित ने कहा…

देख मेरे पंख ...हवाओं ने भी ...
अपना रुख यु बदल दिया |
ड़ाल तो छुम गई ...
पर ड़ाल का पंछी हवा में उड़ गया |

कोमल एहसास और सुंदर भाव लिए हुए बढ़िया कविता.

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति

निवेदिता ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव .... नित नये पूरे होने वाले सपने तुम्हारे नाम दोस्त :)

prerna argal ने कहा…

चाँद सूरज के साथ चलकर ...
हम सफर करते गए |
अब भी न जान पाए
की हमको तुम कैसे मिल गये |bahut khoobsoorat rachanaa.badhaai sweekaren.




please visit my blog.thanks.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

मैं न आई थी , तेरे दर
रास्ता ही खुद मुड गया |...
बहुत खूब .........

PK Sharma ने कहा…

wah minakshi ji
kamal kar diya aapne
dhanyawaad aapka

दिगम्बर नासवा ने कहा…

रास्ता खुद ही मुड गया था ... हवा भी तो उनका पता जानती है ... बहुत खूब लिखा है ..

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर भावमयी रचना...

रजनीश तिवारी ने कहा…

रास्ते खुद मुड़ते जाते हैं मंज़िले मिलती जाती हैं रास्तों में .. लगता है ये सब पहले ही कहीं लिखा होता है ...

chirag ने कहा…

bahut khoob
nice blog
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