ख़ामोशी कि जुबानी



शांत बैठी लहरों को  तब तक कोई कहाँ जान पाता है |
सागर कि उठती लहरें ही तो कराती है प्रलय का भान |

गगन में विचरते बादलों को भी  तब मिलता है सम्मान |
गरज - बरस भिगो धरा को जब करते हैं वो अपना काम | 

हवा के आस्तिव को आज तक कोई कहाँ जान पाया है |
आँधियों का  रूप ही तो उसके होने का पता बताते  है |

खामोश बैठी रूह को कहाँ तब तक कोई  सीने से लगता है |
उसके कर्म ही तो उसे सही - गलत कि पदवी दिलाता है |

इंसान के भीतर के दर्द को कब कहाँ कोई जान पाता है |
उसके चेहरे के  हाव - भाव ही तो इसका पता बताते हैं |

बिना किसी चाहत के कहाँ दे रहा है कोई किसी को प्यार  |
तभी तो सारे जहाँ में खोजता फिर रहा है वो थोडा सम्मान |



10 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

सुन्दर चित्रण के साथ खुबसूरत रचना....

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

bahut khub

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्यार बना रहे विश्व में।

Jyoti Mishra ने कहा…

I loved it a lot..
its so melodious !!

kumar ने कहा…

इंसान के भीतर के दर्द को कब कहाँ कोई जान पाता है |
उसके चेहरे के हाव - भाव ही तो इसका पता बताते हैं |

sach...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

गगन में विचरते बादलों को भी तब मिलता है सम्मान |
गरज - बरस भिगो धरा को जब करते हैं वो अपना काम

सच है कर्म करने पर ही सामान मिलता है ... चित्र भी बहुत कमाल का लगाया है आपने ...

वन्दना ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत लफ़्ज़ संजोये हैं।

kumar zahid ने कहा…

बिना किसी चाहत के कहाँ दे रहा है कोई किसी को प्यार |
तभी तो सारे जहाँ में खोजता फिर रहा है वो थोडा सम्मान |

umda khyalotassavvurat

B.S .Gurjar ने कहा…

बिना किसी चाहत के कहाँ दे रहा है कोई किसी को प्यार |
तभी तो सारे जहाँ में खोजता फिर रहा है वो थोडा सम्मान |
........बहुत सुन्दर ..>

सागर ने कहा…

sundar prstuti....