फूल


कितनी  प्यारी  कितनी  मोहक 
छूने भर से खो दे रौनक |


खुशबु से जग को महकाए 
भवरों का भी मन ललचाए  |


इंसा के मन को है भाती 
दुल्हन को भी खूब सजाती |


प्रभु  के चरणों में शीश नवाकर 
हर मौसम में फिर से खिल जाती |


अपने रंगों से जग को महकाकर 
सारे  जग में  खुशबु फैलाती |


सब घरों  की देखो है ये है शान 
सब ही करते इसका सम्मान |


मंदिर में भी ये  ही तो है जाती 
मस्जिद में देखो शीश नवाती |


इसको न मतलब जात - पात से 
हर सांचे में झट से  ढल जाती |


मातम में भी रहता है इसका साथ 
शादी को भी ये खूब रंगीन बनाती |


इसमें दीखता है देखो कितना संयम 
टूटकर डाली से भी है प्यार जताती |

कितनी प्यार कितनी मोहक
छुने  भर से खो दे रौनक |

खुशबु से जग को महकाती 
भवरों का भी मन ललचाती |

                     

10 टिप्‍पणियां:

mahendra srivastava ने कहा…

वाह, बहुत सुंदर

sushma 'आहुति' ने कहा…

bhaut hi sundar.....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बड़ी प्यारी कविता।

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

bahut sundar, bahut badiya

Patali-The-Village ने कहा…

बड़ी प्यारी कविता। धन्यवाद्|

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

फ़ूल जैसी ही कोमल रचना

Jyoti Mishra ने कहा…

Lovely poem..
easy n catchy as nursery rhymes :)

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन-सुन्दर रचना.

prerna argal ने कहा…

आपकी पोस्ट ब्लोगर्स मीट वीकली (११) के मंच पर प्रस्तुत की गई है /आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/आप इसी तरह मेहनत और लगन से हिंदी की सेवा करते रहें यही कामना है /आपका
ब्लोगर्स मीट वीकली
के मंच पर स्वागत है /जरुर पधारें /

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

kya baat