
नदी चल रही है देखो
सागर में समाने |
कली खिल रही है
फिर से भवरों को रिझाने |
सूरज ले रहा अंगडाई
सुबह का भान करवाने |
काली रात ने ओडी चादर
चांदनी के बहाने |
बादल भी गरजा फिरसे
इंसा कि प्यास बुझाने |
खेत लहलहाए हर दिल कि
उम्मीद जगाने |
मौन धडकने कुछ संभली
माहोल बनाने |
कही चुप रहकर
तो कही कह - कह कर ...
खुद को सब चले हैं सजाने |
फिर भी सृष्टि कि हर कृति
कर रही है समर्पण
सबकी खातिर अपना
कुछ न कुछ गवाने |
9 टिप्पणियां:
बहुत बहुत सुन्दर...
मनोहारी रचना.
khubsurat samarpan!!
pyari si rachna...
बहुत ही बढ़िया।
सादर
उम्दा ... सुन्दर /
मनोहारी भावभीनी अभिव्यक्ति है |मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है|
सब कुछ न कुछ देने को आतुर हैं...
सृष्टि की हर कृति कर रही है समर्पण
सबकी खातिर अपना कुछ न कुछ गवाने !
सुन्दर अभिव्यक्ति!
समर्पण के इतने सुन्दर रूप आपने दिखाये ! आभार आपका ! बहुत ही प्यारी रचना !
bahut sundar
एक टिप्पणी भेजें