जिस्म से अलग मिलो कहीं


आज फिर  सपने में तुम्हें  देखा मैंने ...
इस बार भी तुम्हे छुने की ख्वाइश मन में हुई |
आज फिर बड़ी मुश्किल से खुद को रोका मैंने |
इस बीच तो हवस के सिवा कुछ भी नहीं |
कभी मिलो जिस्म से अलग कही दूर मुझे |
जहाँ न तुम और न ही मैं रहूँ ...
एक दूजे के अहसास का सिर्फ जल तरंग सा बजे |
ये इजहारे और इकरारे वफा से अच्छा होगा |
फिर हवस का न इसमें कोई नामों निशां होगा |

13 टिप्‍पणियां:

dinesh gautam ने कहा…

कभी मिलो जिस्म से अलग कही मुझे
बेहतरीन पंक्तियाँ। देह के क्षणिक सुख से अलग हटकर प्रेम के शाश्वत रूप की स्वीकार्यता को सामने रखती रचना। बहुत अच्छी, बहुत सार्थक। बधाई!

expression ने कहा…

रूह से रूह का मिलन हो...............

बहुत सुंदर मिनाक्षी जी.

Maheshwari kaneri ने कहा…

असली मिलन तो रुह से रुह का ही होता है..बहुत सुंदर मिनाक्षी जी.

dheerendra ने कहा…

ये इजहारे और इकरारे वफा अच्छा होगा |
फिर हवस का न इसमें नामों निशां होगा |

बहुत सुंदर रचना...बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई मीनाक्षी जी,.....
.
MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

मदन शर्मा ने कहा…

वाह! बहुत खुबसूरत एहसास पिरोये है आपने.....

संजय भास्कर ने कहा…

पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...

....... रचना के लिए बधाई स्वीकारें....!!!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

इतना पवित्र प्रेम कहाँ मिलेगा भला..

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

क्या कहने
बहुत सुंदर

Ramakant Singh ने कहा…

जहाँ न तुम और न ही मैं रहूँ ...
एक दूजे के अहसास का सिर्फ जल तरंग बजे |
ये इजहारे और इकरारे वफा अच्छा होगा |
फिर हवस का न इसमें नामों निशां होगा |

प्रेम के शाश्वत रूप की सार्थक रचना । बधाई!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

असली मिलन तो यही है ...

Kunwar Kusumesh ने कहा…

सार्थक/ सुंदर रचना ...

Pallavi ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है आपने बधाई समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/