आरज़ू

जमीं पे बिखरी रेत को ,
आसमां की चाहत हो गई  !
उसे पाने की आरज़ू जो की ,
तकदीर को हमसे शिकायत हो गई !
दोस्तों अब ये मरहम , 
ना लगाओ मेरे जख्मो पर !
पत्थरों से मोहोब्त  करते करते ,
चोट खाने की आदत हो गई !

3 टिप्‍पणियां:

Anupam karn ने कहा…

पत्थरों से मोहोब्त करते करते ,
चोट खाने की आदत हो गई !

बढ़िया पोस्ट !!

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

aaj ek se badkar ek prastuti di aapne

Suman ने कहा…

bahut sunder...........
mere blog par ane ka shukriya.........