प्रकृति का नज़ारा

  

प्रकृति का ये नज़ारा है |
बहती नदिया की धारा है |
झरनों का शोर निराला है ,
सृष्टि ने इसको बनाया है |
न कोई साज़ न ही आवाज़
फिर भी इसमें है कोई बात ,
जो अपने पास बुलाती है |
मदमस्त हमें  कर जाती
क्या है इस आलोकिक शक्ति में  ,
जो बार - बार  इठलाती है |
फूलों की छटा लिए वादियाँ  ,
भंवरों का गीत सुनाती है |
नील गगन में  उड़ते बादल ,
पंछी का नाच दिखाती  हैं |
 बर्फ से ढकीं  हुई चादर  ,
हिम का मुकुट बन जाती है |
सारी प्रकृति अपनी कला दिखा ,
हम सबको  खूब रिझाती है |
सूरज की किरणें भी आ- आ के
अपने होने को दर्शाती है |
अपनी किरणों को घाटी में  बिखेर ,
स्वर्ग का एहसास दिलाती है |

9 टिप्‍पणियां:

: केवल राम : ने कहा…

सारी प्रकृति अपनी कला दिखा ,
हम सबको खूब रिझाती है !

ईश्वर द्वारा रचित यह प्रकृति हमें जीवन में आनंद , उमंग और उत्साह सब कुछ देती है ....हम जितना प्रकृति के करीब होते हैं उतना ही हम आनंदित होते हैं ...आपका आभार इस प्रेरणादायी प्रस्तुति के लिए

योगेन्द्र पाल ने कहा…

अच्छा है :)

दीप्ति शर्मा ने कहा…

bahut sunder post hai aapki
aabhar
...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रकृति का अहनद नाद।

संजय भास्कर ने कहा…

प्रेरणादायी प्रस्तुति

Minakshi Pant ने कहा…

मैं आप सबकी शुक्रगुजार हूँ दोस्तों ये आपकी मेहरबानी है की आप मेरे लेख पढ़ते है और इसकी सराहना करते हो
इससे मुझे और बेहतर लिखने की ताक़त मिलती है शुक्रिया दोस्तों !

sagebob ने कहा…

बहुत आलौकिक है प्रकृति.
आपने बहुत खूबसूरत ढंग से लिखा है.
शुभ कामनाएं

Dorothy ने कहा…

प्रकृति की इंद्रघनुषी छटा बिखेरती खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

OM KASHYAP ने कहा…

न कोई साज़ न ही आवाज़ ! फिर भी लगता है , है तो कोई बात ,
bahut hi acche bhav he