सिर्फ समर्पण

प्यार का मतलब ...
अगर दान जैसा होता |
तो इंसा खुद से इतना 
परेशान न होता |
प्रकृति और  इंसा के प्यार में 
बस यही एक है अंतर  |
उसके अन्दर  लेने की 
चाहत जो  नहीं है |
हम जानते हैं इंसा सिर्फ
भावनाओं में है जीता |
कुछ देके लेने की 
चाहत है करता | 
यही उसके दुःख का 
कारण है बनता |
अगर ऐसा न होता तो वो 
कभी तन्हा  न होता |
सब उसके  होते और 
वो सबका होता |
पाने की चाहत में 
वो इंसां को बांधना है चाहता |
न बंधने  की चाहत में 
वो उसको खोता है जाता |
प्यार तो पहले ही से 
बंधने से है डरता |
न बंधने  की चाहत में 
वो इंसा से दूर - दूर होता |
इसी भ्रम में इंसा  
अपना जीवन बिताता |
बिना कुछ पाए ही 
दुनिया से है जाता |   

16 टिप्‍पणियां:

Dr Varsha Singh ने कहा…

पाने की चाहत में वो इंसां को बांधना है चाहता | न बंधने की चाहत में वो उसको खोता है जाता |

संवेदनशील रचना ...
आपने बहुत सुन्दर शब्दों में अपनी बात कही है। शुभकामनायें।

शिखा कौशिक ने कहा…

इसी भ्रम में इंसा
अपना जीवन बिताता |
बिना कुछ पाए ही
दुनिया से है जाता |
bahut bhavpoorn rachna .badhai

बेनामी ने कहा…

apne bilkul sahi kaha hai,

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ये अपेक्षाएं ही तो इंसान को दुखी करती हैं ...अच्छी रचना

Rakesh Kumar ने कहा…

मीनाक्षी जी आपने तो गजब ढहा दिया है
प्यार का मतलब सही सही समझा दिया है
प्यार का मतलब नहीं है कुछ दे कर लेना
त्याग और समर्पण ही है जीवन का गहना

सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.

मेरी नई पोस्ट आपका इंतजार कर रही है.

Dinesh pareek ने कहा…

बहुत ही सुन्दर लिखा है अपने इस मैं कमी निकलना मेरे बस की बात नहीं है क्यों की मैं तो खुद १ नया ब्लोगर हु
बहुत दिनों से मैं ब्लॉग पे आया हु और फिर इसका मुझे खामियाजा भी भुगतना पड़ा क्यों की जब मैं खुद किसी के ब्लॉग पे नहीं गया तो दुसरे बंधू क्यों आयें गे इस के लिए मैं आप सब भाइयो और बहनों से माफ़ी मागता हु मेरे नहीं आने की भी १ वजह ये रही थी की ३१ मार्च के कुछ काम में में व्यस्त होने की वजह से नहीं आ पाया
पर मैने अपने ब्लॉग पे बहुत सायरी पोस्ट पे पहले ही कर दी थी लेकिन आप भाइयो का सहयोग नहीं मिल पाने की वजह से मैं थोरा दुखी जरुर हुआ हु
धन्यवाद्
दिनेश पारीक
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/
http://vangaydinesh.blogspot.com/

***Punam*** ने कहा…

"पाने की चाहत में
वो इंसां को बांधना है चाहता |
न बंधने की चाहत में
वो उसको खोता है जाता |
प्यार तो पहले ही से
बंधने से है डरता |
न बंधने की चाहत में
वो इंसा से दूर - दूर होता |
इसी भ्रम में इंसा
अपना जीवन बिताता |
बिना कुछ पाए ही
दुनिया से है जाता |"

बहुत ही सुंदर रचना.........
कुछ अलग सी
कुछ तेरे
और कुछ मेरे जैसी..
आभार....!!

अविनाश मिश्र ने कहा…

कुछ देके लेने की
चाहत है करता |
यही उसके दुःख का
कारण है बनता |
बहुत ही सुन्दर बात कही है मीनाक्षी जी आपने

दिल को छू गयी ये पंक्तियाँ

बधाई

avinash001.blogspot.com

विजय रंजन ने कहा…

paane aur khone ke pare jo hai wahi pyar hai...bahut badhiya se samjhaya aapne meenakshi ji...dhanyavaad.

ana ने कहा…

उत्तम रचना

वीना ने कहा…

लेकर देने की रीत पुरानी है और दुख का कारण भी...
बहुत अच्छी...

Ashu ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Ashu ने कहा…

बहुत खूब रचना मीनाक्षी जी

प्यार का मतलब ...
अगर दान जैसा होता
तो इंसा खुद से इतना परेशान न होता

गर दान का मूल भी इंसान समझ पाता
तो इंसान खुद से इतना परेशान न होता
दान भी कहाँ वो आज तक समझ पाया है |
हर दान मैं भी वो अपनी स्वार्थ कहाँ भुला पाया है?
हर बंद दाहिने हथेली के ऐवज में
बाये हथेली का न खोलना कहाँ वो भूल पाया है?


बहुत खूब रचना मीनाक्षी जी
keep writing
sanjay
http://chaupal-ashu.blogspot.com/

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जब कुछ अपना है ही नहीं तब काहे का मोह।

sushma 'आहुति' ने कहा…

bhut bhaavpur rachna..

Hadi Javed ने कहा…

प्रकृति और इंसा के प्यार में बस यही एक है अंतर | उसके अन्दर लेने की चाहत जो नहीं है |
सुन्दर नज़्म ज़िन्दगी की तल्ख़ सच्चाई को बयाँ करने में आपकी नज़्म पूरी तरह कामयाब है
मुबारकबाद आपको इस खुबसूरत तखलीक के लिए वाह