बस ख्यालों में

छन - छन - छन - छन  - छन 
झंकृत करती सी ये प्यारी ध्वनी |
कानों को मोहित करने लगी |
लगता है जैसे गाँव की  दुल्हन ,
शहर में रहने को  मचलने लगी |
वो चूड़ियों की खनखनाहट ,
दिल में घर यूँ करने लगी ,
जैसे सात स्वरों के साथ वीणा
खुद बजने लगी |
सर से सरकता वो पल्लू 
बेताबी एसे बढ़ाने लगा ,
जैसे  बादलों की ओट से 
चाँद का दीदार होने लगा |
उसकी खिलखिलाती सी हंसी
कली से फुल बनने लगी |
उसकी बलखाती सी वो चाल
न जाने कैसा असर करने लगी 
जैसे साकी पर बिन पिए ही ...
असर करने लगी |
न जाने ये कैसी बैचेनी
मुझमें अब होने लगी |
ख्यालों की ये खुबसूरत बला
हकीक़त में तबदील होने लगी |

6 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मधुरिम पंक्तियाँ।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुंदर सहमे ख्याल ...

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

ati sundar rachna, bahut hi sundar khyaal

Rahul Singh ने कहा…

तस्‍वीर से आगे बढ़ने में समय लगा, इतनी सुंदर तस्‍वीर चुनें तो सुझाव है कि उसे अंत में लगाएं, आरंभ में नहीं.

Atul Shrivastava ने कहा…

तस्‍वीर तो जैसी भी है, आपकी कलम ने इस तस्‍वीर को भी फीका कर दिया।
इतना अच्‍छा लिखा कि मन में कल्‍पना के जरिए एक सुंदर दुल्‍हन बन गई जो तस्‍वीर से ज्‍यादा अच्‍छी है।
अच्‍छे शब्‍द अच्‍छे विचार अच्‍छे भाव।

मनोज कुमार ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति।